कविता, प्रवासी काव्यधारा - No Comments » - Posted on November, 22 at 2:12 am
-सरोज सूदहोरी आई रे रंगीली
होरी आई रे छबीली
होरी आई रे, आई रे, होरी आई रे।
गांव-गांव अरु गलियन-गलियन
शोर भयो है भारी
हाट-बाट सब छोड़ी-छाड़ी
ले आए भरयो पिचकारी॥ होरी…
ढप बाजे अरु ढोलक बाजे
बाजहिं झांझ करताला,
किटकिम-किटकिम धुनि धनननन
चलहिं सुरन पर ताला॥ होरी…
घर आंगन अरु द्वारे-द्वारे
आनन्द मंगल छाई रे
ना कोई दुश्मन ना कोई बैरी
गरेहु-मिलिहैं भाई-भाई रे॥ होरी…
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कविता, प्रवासी काव्यधारा - No Comments » - Posted on November, 22 at 1:59 am
-रश्मि तिवारीसमुन्दर पार
अनजाने पथ पर
अकेला मन जब भटक जाता है।
पहचाने वृक्षों के नीचे बैठ
हृदय अपनापन पाता है।
शाखाओं से उलझकर आती समीर से सिहरन
पत्तियों से छनती धूप की गर्मी
प्रकृति का प्यार तो वैसे ही दुलारता है।
पर तभी उस चंचल फूल का प्रश्न…
बटोही
कौन हो तुम?
और क्यों उदास?
सब कुछ तो है तुम्हारे पास…
पर कहां
अपनत्व और ममत्व का उजास॥
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कविता, प्रवासी काव्यधारा - No Comments » - Posted on November, 22 at 1:56 am
-पुष्पा भार्गवदो राहों के बीच बटोही
इधर ज्ञान प्रासाद, उधर है
प्रेम कुटी कह जाता कोई
इधर खड़ीं निष्पक्ष न्याय के
मंदिर की ऊंची मीनारें
उधर देख करुणा के रज पर
बहती ममता की जल धारें
इधर खड़ी है अतुल सम्पदा
लक्ष्मी का मद यौवन नर्तन
उधर भारती का शुचि-कानन
कह कर क्यों रुक जाता कोई।
उधर धर्म की वेदी पर है
धूप-दीप नैवेद्य समर्पण
इधर राजनीति का [...]
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कविता, प्रवासी काव्यधारा - No Comments » - Posted on November, 22 at 1:45 am
-राज मौडगिलहिन्द देश की हिन्दी जो
भारत की राष्ट्र भाषा है
हमारी सभ्यता से उसका
धागे-मोती का नाता है।
जन्म दिया संस्कृत ने जिसको
हिन्दू धर्म ने पाला है
धागे में उसके बंधी हुई
संस्कारिक भावों की माला है।
ट्टषियों की जिसमें कथा कहानी
मीरा और सूर की वाणी है
दास कबीर की रचनाएं
सुखदायी और कल्याणी है।
हमारे शास्त्र और ग्रन्थों की
सरल सुरीली यह भाषा है
कविता [...]
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कविता, प्रवासी काव्यधारा - No Comments » - Posted on November, 21 at 6:53 am
-डॉ. इंदिरा आनंद
जब से पाया तुमको प्रियतम
भूली मैं सारा संसार
धुंधले स्वपनों की आभा में
देखा तुमको कितनी बार,
परख न पाई तुम्हीं आधार
फंसती जब मैं थी मझधार।
जब से जाना तुमको प्रियतम
मिला नैया को खेवनहार
जब से पाया…
मन मूरख जग संग लिपटा था
बिसर गया था अपना धाम,
अंधकार में भटक रहे थे
निराधार से मेरे प्राण
जब से ढूंढ़ा तुमने प्रियतम
हुआ प्रतिफल [...]
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