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कविता - विश्व हिन्दी सम्मेलन पर

कविता - No Comments » - Posted on November, 22 at 6:35 am

(ओसाका, जापान से डा. यासमीन सुलताना नकवी की कविताएं)
आओ, फिर से आओ
आओ-आओ अमीर खुसरो
स्वतन्त्र भारत को
फिर से नूतन वाणी दो
आवश्यकता है
तुम्हारे चिंतन की
मनमंथन की
हृदय के धड़कन की
तुम्हारे हृदय में फिर
धधक उठे तीव्र ज्वाला
रच दो कोई भजन
राम, रहीम रस वाला
फ्गोरे-गोरे मुखड़े पे
श्याम चदरिया ओढे
सोए सुरवालाय्
झूम के हर कोई गाए
पीकर प्रेम-भक्ति का प्याला,
हो मतवाला
कहां हो आओ
रास्ता उलझा [...]

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कविता - कौन सी महफिल में जाओगे

कविता - No Comments » - Posted on November, 22 at 6:26 am

-वेद प्रकाश ‘वटुक’ यू.एस.ए
कौन सी महफिलों में जाओगे
दर्द अपना किसे सुनाओगे
मौन मानव के साथ धोखा है
सच कहोगे, तो मारे जाओगे
जहर सुकरात को पिलायेंगे
सूली ईसा को वे चढ़ायेंगे
कातिलों का भी फलसफा तो है
कत्ल करके मसीह बनायेंगे
बस मुखौटे ही चन्द बदले हैं
केंचुली के ही रंग बदले हैं
सांप, फन, जहर कुछ नहीं बदले
काटने के ही ढंग बदले हैं
वही [...]

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कविता - जीवन सत्य

कविता - No Comments » - Posted on November, 22 at 6:09 am

-जय वर्मा
परीक्षा के गलियारे से
जब गुजरता है इंसान
संकीर्ण दायरों का
तब होता है एहसास
अनुभवों की लकीरों पर चलकर
स्वयं ही सीखता है वह
अनुभूतियों की गहराई
और कर्म का महत्वपूर्ण सिध्दान्त
राग द्वेष कम करने के लिए
स्वयं प्रयत्न करता है वह
व्यावहारिक स्वभाव से
अंत:करण की शुध्दि
करना चाहता है वह
जानता है कि कर्म फल से
किसी को भी छुटकारा नहीं मिलता
विरासत में मिली [...]

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कविता - नवगीत

कविता - No Comments » - Posted on November, 22 at 4:29 am

-श्याम ‘अंकुर’, भारतसभी जगह है एक सा
शूलों का व्यवहार।
फूलों की नीलामी करते
लूट-लूट कर घर को भरते
फिर भी इनके हाथ में
किसने दी पतवार
मजबूरी का लाभ उठाते
दूजे का हक खुद ही खाते
धोखा देकर बन गये
बस्ती के सरदार।
करते रहते खून-खराबा
ना है भाता काशी-काबा
खून सनी ‘अंकुर’ रही
इनकी हर तलवार।
दुख से कर तू सामना
दिल में धर ले धीर।
रोने से क्या [...]

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स्मृति-दंशों मे सतत् लन्दन

कविता - No Comments » - Posted on November, 22 at 3:22 am

-डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, यू.के.
इस उदास गली में
गैस का जो चिराग जलता है
उसे मिसेज जोन्स
एक गुजर गए सुनहले युग का प्रतीक और
साक्षी मानती हैं
और इस बची हुई गली का
आखिरी संघर्ष-आखिरी स्टैंड।
बकौल इनके
सिर्पफ यही है जो रोज अंधेरे को मिटाता है
सूर्य यहां पहुंच नहीं पाता है
और धीरे-धीरे
जो कुछ भी बचा रह गया है
सीलता-टूटता-बिखरता जाता है।
उनकी खिड़कियों के [...]

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होरी

कविता, प्रवासी काव्यधारा - No Comments » - Posted on November, 22 at 2:12 am

-सरोज सूदहोरी आई रे रंगीली
होरी आई रे छबीली
होरी आई रे, आई रे, होरी आई रे।
गांव-गांव अरु गलियन-गलियन
शोर भयो है भारी
हाट-बाट सब छोड़ी-छाड़ी
ले आए भरयो पिचकारी॥ होरी…
ढप बाजे अरु ढोलक बाजे
बाजहिं झांझ करताला,
किटकिम-किटकिम धुनि धनननन
चलहिं सुरन पर ताला॥ होरी…
घर आंगन अरु द्वारे-द्वारे
आनन्द मंगल छाई रे
ना कोई दुश्मन ना कोई बैरी
गरेहु-मिलिहैं भाई-भाई रे॥ होरी…

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उजास

कविता, प्रवासी काव्यधारा - No Comments » - Posted on November, 22 at 1:59 am

-रश्मि तिवारीसमुन्दर पार
अनजाने पथ पर
अकेला मन जब भटक जाता है।
पहचाने वृक्षों के नीचे बैठ
हृदय अपनापन पाता है।
शाखाओं से उलझकर आती समीर से सिहरन
पत्तियों से छनती धूप की गर्मी
प्रकृति का प्यार तो वैसे ही दुलारता है।
पर तभी उस चंचल फूल का प्रश्न…
बटोही
कौन हो तुम?
और क्यों उदास?
सब कुछ तो है तुम्हारे पास…
पर कहां
अपनत्व और ममत्व का उजास॥

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दो राहा

कविता, प्रवासी काव्यधारा - No Comments » - Posted on November, 22 at 1:56 am

-पुष्पा भार्गवदो राहों के बीच बटोही
इधर ज्ञान प्रासाद, उधर है
प्रेम कुटी कह जाता कोई
इधर खड़ीं निष्पक्ष न्याय के
मंदिर की ऊंची मीनारें
उधर देख करुणा के रज पर
बहती ममता की जल धारें
इधर खड़ी है अतुल सम्पदा
लक्ष्मी का मद यौवन नर्तन
उधर भारती का शुचि-कानन
कह कर क्यों रुक जाता कोई।
उधर धर्म की वेदी पर है
धूप-दीप नैवेद्य समर्पण
इधर राजनीति का [...]

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हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा

कविता, प्रवासी काव्यधारा - No Comments » - Posted on November, 22 at 1:45 am

-राज मौडगिलहिन्द देश की हिन्दी जो
भारत की राष्ट्र भाषा है
हमारी सभ्यता से उसका
धागे-मोती का नाता है।
जन्म दिया संस्कृत ने जिसको
हिन्दू धर्म ने पाला है
धागे में उसके बंधी हुई
संस्कारिक भावों की माला है।
ट्टषियों की जिसमें कथा कहानी
मीरा और सूर की वाणी है
दास कबीर की रचनाएं
सुखदायी और कल्याणी है।
हमारे शास्त्र और ग्रन्थों की
सरल सुरीली यह भाषा है
कविता [...]

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प्रियतम

कविता, प्रवासी काव्यधारा - No Comments » - Posted on November, 21 at 6:53 am

-डॉ. इंदिरा आनंद
जब से पाया तुमको प्रियतम
भूली मैं सारा संसार
धुंधले स्वपनों की आभा में
देखा तुमको कितनी बार,
परख न पाई तुम्हीं आधार
फंसती जब मैं थी मझधार।
जब से जाना तुमको प्रियतम
मिला नैया को खेवनहार
जब से पाया…
मन मूरख जग संग लिपटा था
बिसर गया था अपना धाम,
अंधकार में भटक रहे थे
निराधार से मेरे प्राण
जब से ढूंढ़ा तुमने प्रियतम
हुआ प्रतिफल [...]

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