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	<title>PURWAI &#124; पुरवाई</title>
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	<description>Just another WordPress weblog</description>
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		<title>आपके पत्र</title>
		<description>नमस्कार,

मुझे एक सप्ताह पूर्व 'पुरवाई' का पिछला अंक प्राप्त हुआ। इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। पुरवाई के सारे अंक दिन-प्रतिदिन सार्थक होते जा रहे हैं जो पत्रिका की सफलता का सबसे बड़ा कारण है। बधाई हो आप सब को।
भारत में कहा जाता है कि जब पुरवाई चलती है तो आदमी आलस्य ...</description>
		<link>http://www.purwai.com/?p=88</link>
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		<title>पुरवाइयां</title>
		<description>-डा. पद्मेश गुप्त

पुरवाई के जीवनकाल का यह तीसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन है। लंदन में हुए छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन एवं सुरिनाम में आयोजित सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के सुअवसर पर पुरवाई विशेषांक ले कर आई थी। विश्व भर के अनेक हिन्दी प्रेमियों तक पत्रिका पहुुंची। इस बार विश्व हिन्दी सम्मेलन ...</description>
		<link>http://www.purwai.com/?p=84</link>
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		<title>लेख - हिन्दी के ये सम्मेलन, ये उत्सव</title>
		<description>-डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, यू.के.

मुझे चालीस वर्षों से हिन्दी भाषा और साहित्य को पढ़ाते हुए जो एक बात बेहद अखरती रही, वो ये कि हिन्दी के हितैषी भारतीय, गोरी चमड़ी वाले प्राध्यापकों के प्रति अतिरिक्त भक्तिभाव का प्रदर्शन करते हैं। यह बिल्कुल भी जरूरी चीज न थी और न है।

अभी कुछ ...</description>
		<link>http://www.purwai.com/?p=82</link>
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		<title>कविता - विश्व हिन्दी सम्मेलन पर</title>
		<description>(ओसाका, जापान से डा. यासमीन सुलताना नकवी की कविताएं)

आओ, फिर से आओ
आओ-आओ अमीर खुसरो
स्वतन्त्र भारत को
फिर से नूतन वाणी दो
आवश्यकता है
तुम्हारे चिंतन की
मनमंथन की
हृदय के धड़कन की
तुम्हारे हृदय में फिर
धधक उठे तीव्र ज्वाला
रच दो कोई भजन
राम, रहीम रस वाला
फ्गोरे-गोरे मुखड़े पे
श्याम चदरिया ओढे
सोए सुरवालाय्
झूम के हर कोई गाए
पीकर प्रेम-भक्ति का ...</description>
		<link>http://www.purwai.com/?p=76</link>
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		<title>लेख - डायसपोरा में हिन्दी साहित्य-रचना</title>
		<description>-सुषम बेदी, यू.एस.ए.

बात यह है कि विदेशी भारतीयों को रचनात्मक कर्म के लिये नयी भावभूमि तो सहज ही हासिल हो गयी है पर उसकी अभिव्यक्ति का कलात्मक पक्ष अभी भी कमजोर है। जब तक इस दिशा में न केवल नयी भावभूमियों की तलाश, बल्कि उस तलाश के साथ अभिव्यंजना के ...</description>
		<link>http://www.purwai.com/?p=74</link>
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		<title>लेख - शोषण के लिए प्रस्तुत लेखक</title>
		<description>-डा. गौतम सचदेव, यू.के.

पैसे देकर छपने वाले लेखक एक ओर प्रकाशकों को अधिकाधिक शोषक बना रहे हैं, तो दूसरी ओर स्वयं अपना अवमूल्यन करवा रहे हैं। उधर प्रकाशक और लेखक के सामने पाठक बेबस हैं, जिन्हें अच्छे साहित्य के स्थान पर अधिकतर बेकार की चीजें पढ़ने को मिल रही हैं।

प्रकाशकों ...</description>
		<link>http://www.purwai.com/?p=72</link>
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		<title>कविता - कौन सी महफिल में जाओगे</title>
		<description>-वेद प्रकाश 'वटुक' यू.एस.ए

कौन सी महफिलों में जाओगे
दर्द अपना किसे सुनाओगे
मौन मानव के साथ धोखा है
सच कहोगे, तो मारे जाओगे

जहर सुकरात को पिलायेंगे
सूली ईसा को वे चढ़ायेंगे
कातिलों का भी फलसफा तो है
कत्ल करके मसीह बनायेंगे

बस मुखौटे ही चन्द बदले हैं
केंचुली के ही रंग बदले हैं
सांप, फन, जहर कुछ नहीं बदले
काटने ...</description>
		<link>http://www.purwai.com/?p=70</link>
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		<title>लेख - विश्व हिन्दी सचिवालय का सफरनामा</title>
		<description>-इन्द्रदेव भोला इन्द्रनाथ, मारीशसविश्व हिन्दी सचिवालय का शिलान्यास हुए अब सात वर्ष बीत चुके हैं। पर अब भी हम इसी प्रतीक्षा में हैं कि विश्व सचिवालय के भवन का निर्माण कब होगा।

सन् 1975 हिन्दी जगत का ऐतिहासिक वर्ष था। इसी वर्ष में भारत के शहर नागपुर में प्रथम विश्व हिन्दी ...</description>
		<link>http://www.purwai.com/?p=68</link>
			</item>
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		<title>लेख - एक निरंतरता का सवाल है बाबा</title>
		<description>-प्रेम जनमेजय, भारतयदि हम ध्यान से अवलोकन करें तो क्या जिन देशों में हमने अत्यधिक सक्रिय सम्मेलन किए हैं, वहां क्या कोई सक्रियता बना पाए हैं? मेरे पास तो त्रिनिडाड का अनुभव है। उस देश में एक विश्व हिंदी सम्मेलन और दो अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं और हिंदी ...</description>
		<link>http://www.purwai.com/?p=66</link>
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		<title>कविता - जीवन सत्य</title>
		<description>-जय वर्मा
परीक्षा के गलियारे से
जब गुजरता है इंसान
संकीर्ण दायरों का
तब होता है एहसास
अनुभवों की लकीरों पर चलकर
स्वयं ही सीखता है वह
अनुभूतियों की गहराई
और कर्म का महत्वपूर्ण सिध्दान्त
राग द्वेष कम करने के लिए
स्वयं प्रयत्न करता है वह
व्यावहारिक स्वभाव से
अंत:करण की शुध्दि
करना चाहता है वह
जानता है कि कर्म फल से
किसी को भी ...</description>
		<link>http://www.purwai.com/?p=64</link>
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