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	<title>PURWAI &#124; पुरवाई</title>
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	<pubDate>Mon, 24 Nov 2008 13:17:40 +0000</pubDate>
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		<title>आपके पत्र</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2008 11:54:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[आपके पत्र]]></category>

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		<description><![CDATA[नमस्कार,
मुझे एक सप्ताह पूर्व &#8216;पुरवाई&#8217; का पिछला अंक प्राप्त हुआ। इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। पुरवाई के सारे अंक दिन-प्रतिदिन सार्थक होते जा रहे हैं जो पत्रिका की सफलता का सबसे बड़ा कारण है। बधाई हो आप सब को।
भारत में कहा जाता है कि जब पुरवाई चलती है तो आदमी आलस्य के कारण कुछ नहीं करता। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: left;"><strong>नमस्कार,</strong></p>
<p style="text-align: left;">मुझे एक सप्ताह पूर्व &#8216;पुरवाई&#8217; का पिछला अंक प्राप्त हुआ। इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। पुरवाई के सारे अंक दिन-प्रतिदिन सार्थक होते जा रहे हैं जो पत्रिका की सफलता का सबसे बड़ा कारण है। बधाई हो आप सब को।<br />
भारत में कहा जाता है कि जब पुरवाई चलती है तो आदमी आलस्य के कारण कुछ नहीं करता। किन्तु इस पुरवाई की बात निराली है। यह पुरवाई जब आप लोगों के बीच से निकल कर इधर-उधर चारों तरफ जाती, चलती-फिरती है तो साहित्यिक वातावरण में एक नई चेतना कौंध जाती है। सोया हुआ मन जाग जाता है। नई-नई गतिविधियों से लोग-बाग परिचित होते हैं। उनके भीतर नई सोच पैदा होती है।<br />
-यासमीन सुलताना नकवी<br />
ओसाका, जापान</p>
<p style="text-align: left;">
<p style="text-align: left;"><strong>माननीय संपादक जी,</strong><br />
पुरवाई में उषा राजे की कहानी &#8216;वह रात&#8217; पढ़ी। कहानी हर दृष्टि से एक श्रेष्ठ कहानी है। इस कहानी को लेकर रश्मि मित्तल की आलोचना आधारहीन है। लगता है उन्हें कहानी समझ में नहीं आई। कहानी किसी वेश्या की कहानी नहीं है, वह एक मां और बच्चों के बांड (ठवदक) की कहानी है जिसमें ब्रिटिश समाज के नदवितजनदंजम लोगों का चेहरा दिखाया गया है। कहानी का धरातल यथार्थ है।<br />
-पी.डी. माल्हन,<br />
भैकनेल, बर्क</p>
<p style="text-align: left;"><strong>नमस्कार,</strong></p>
<p style="text-align: left;">मैं &#8216;पुरवाई&#8217; पत्रिका की नियमित पाठिका हूं। मैंने अक्टूबर-दिसंबर 2006 तथा जनवरी-मार्च 2007 के अंक पढ़े। अक्टूबर-दिसंबर 2006 में प्रकाशित श्रीमती उषा राजे सक्सेना द्वारा रचित &#8216;वो रात&#8217; कहानी में प्रदर्शित मानवीय संवेदना उल्लेखनीय है। लेकिन अगले अंक में प्रकाशित आपके पत्र विभाग में एक पत्र को पढ़कर मुझे खासी निराशा हुई और मन को बहुत ठेस पहुंची क्योंकि उसमें &#8216;वो रात&#8217; कहानी की अनावश्यक आलोचना की गई थी।</p>
<p style="text-align: left;">रश्मि मित्तल के पत्र को पढ़ने के बाद ऐसा ज्ञात हुआ कि वह ब्रिटेन को अच्छी तरह से नहीं जानती हैं। आज ब्रिटेन में कुछ ऐसे-ऐसे लोग भी हैं जिन को पेट भर खाना नहीं मिलता, जिनके पास रोजगार नहीं है और जिन के पास घर नहीं है। ब्रिटेन का यह पहलू दिखाने के लिए किसी को कुछ ज्यादा करने की जरूरत नहीं है, जरूरत है तो सिर्पफ आंखें खोलने की और उससे वहां के समाज को देखने की। रश्मि मित्तल ने अपने पत्र में &#8216;वो रात&#8217; कहानी की जो तीखी आलोचना की है, उससे यह साफ प्रतीत होता है कि वह कहानी में प्रदर्शित मानवीय संवेदनाओं को समझने में असमर्थ रही हैं। &#8216;वो रात&#8217; कहानी का मूल आधार मां और उसके बच्चों के बीच का प्यार है, वेश्यावृत्ति नहीं। कहानी में किसी भी प्रकार से वेश्यावृत्ति को प्रोतसाहन नहीं दिया गया है। कहानी में बहुत ही खूबसूरती के साथ बच्ची की भावनाओं को दर्शाया गया है और निचले वर्ग के परिवार की मुश्किलों को बहुत ही बारीकी के साथ प्रदर्शित किया गया है।</p>
<p style="text-align: left;">मैं यह मानती हूं कि मैं एक अच्छे लेखक की तरह लिखने में असमर्थ हूं पर मैं हिन्दी बहुत अच्छी तरह समझ सकती हूं। मैं चाहती हूं कि मेरे पत्र के माध्यम से पुरवाई के पाठकों को कहानी के मूल आधार के बारे में पता चले।<br />
-प्रज्ञा<br />
शैफ्टेसबरी रोड, लंदन</p>
<p style="text-align: left;"><strong>पद्मेश जी<br />
नमस्कार,</strong><br />
पुरवाई का अक्टूबर-दिसंबर अंक मिला। धन्यवाद। वह रात कहानी के लिए उषा जी को ढेरों बधाइयां। शिल्प, कथ्य एवं संप्रेषण, हर स्तर पर कहानी प्रभावित करती है। इस कहानी ने ब्रिटेन के एक कटु सत्य को सामने रखा है।<br />
-सुशील सरित<br />
आगरा, भारत</p>
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		<title>पुरवाइयां</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2008 11:46:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[पुरवाइयाँ]]></category>

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		<description><![CDATA[-डा. पद्मेश गुप्त
पुरवाई के जीवनकाल का यह तीसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन है। लंदन में हुए छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन एवं सुरिनाम में आयोजित सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के सुअवसर पर पुरवाई विशेषांक ले कर आई थी। विश्व भर के अनेक हिन्दी प्रेमियों तक पत्रिका पहुुंची। इस बार विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर मैंने सोचा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>-डा. पद्मेश गुप्त</p>
<p>पुरवाई के जीवनकाल का यह तीसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन है। लंदन में हुए छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन एवं सुरिनाम में आयोजित सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के सुअवसर पर पुरवाई विशेषांक ले कर आई थी। विश्व भर के अनेक हिन्दी प्रेमियों तक पत्रिका पहुुंची। इस बार विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर मैंने सोचा कि क्यों न मैं पुरवाई को विश्व हिन्दी सम्मेलन पर पूर्णत: आधारित न करते हुए उसे कुछ वास्तविक रंग में प्रस्तुत करूं। विश्व हिन्दी सम्मेलन पर पूर्णत: समर्पित तो अनेक पत्रिकाएं अमरीका जाने की तैयारी में लगी हुई हैं। परन्तु, हमारी पुरवाई इस विश्व हिन्दी सम्मेलन में समर्पण के लिए तैयार हुई है अपने सहज और सरल शृंगार के साथ। पुरवाई का वास्तविक परिचय यही है, नए लेखकों को प्रेरित करना, स्थापित रचनाकारों का आशीर्वचन लेना, हर रंग के साहित्य को स्थान देना, सिर्फ भारत या इंग्लैण्ड ही नहॅ अपितु विश्व के जिस कोने से हिन्दी की आवाज़ आए, उसे आत्मसात करना और जहां हिन्दी खामोश हो वहां हिन्दी को आवाज़ देना।</p>
<p>किसी एक विधा या एक दृष्टिकोण की पत्रिका नहॅ है पुरवाई। किसी एक विचार या एक सोच की पत्रिका भी नहॅ है पुरवार्इ्र। पुरवाई में सम्पूर्ण भारत बसता है। हमारा सौभाग्य है कि आज विश्व के करीब 26 देशों में पुरवाई अपने कदम रख चुकी है। इस विश्व हिन्दी सम्मेलन में दस वर्षीय पुरवाई उस नन्हॅ बालिका की तरह है, जिसकी आंखों में बड़े-बड़े सपने उमड़ने लगे हैं। वह देख सकती है कि हिन्दी का बुरा और भला किसमें है। सदा की तरह पुरवाई इस बार भी सकारात्मक दृष्टि के साथ विश्व हिन्दी सम्मेलन में पहुंच रही है। किसी भी भेदभाव से ऊपर उठ कर हम आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन को हिन्दी का एक और महायज्ञ मानते हैं। मैं चाहता हूं कि इस सम्मेलन से अमरीका के सैकड़ों हिन्दी प्रेमियों को वही सुख मिले जो 1999 में ब्रिटेन के हिन्दी प्रेमियों को मिला था। अपने प्रिय लेखकों का सान्निध्य, दूर अलग-अलग देशों से आए प्रतिनिधियों से परिचय और विभिन्न संस्थाओं के कार्यकर्ताओं से प्रेरणा मिलना ही विश्व हिन्दी सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है।</p>
<p>मैं आभारी हूं अपने साहित्यकार भाई तेजेन्द्र शर्मा जी का जिन्होंने पिछले दो वर्षों में पुरवाई के संपादक के रूप में पुरवाई को अपने साहित्यिक अंदाज़ में प्रस्तुत किया। इस पत्रिका को भारत के शीर्ष साहित्यकारों से जोड़ा। पुरवाई अब फिर हिन्दी प्रेमियों की गोद में आ गई है और अपने बड़ों के आशीर्वाद के साथ विश्व के समस्त उभरते हुए हिन्दी रचनाकारों के स्वागत में अपने दोनों हाथ फैलाए आप सबका अभिवादन कर रही है।</p>
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		<title>लेख - हिन्दी के ये सम्मेलन, ये उत्सव</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2008 11:42:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[लेख]]></category>

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		<description><![CDATA[-डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, यू.के.
मुझे चालीस वर्षों से हिन्दी भाषा और साहित्य को पढ़ाते हुए जो एक बात बेहद अखरती रही, वो ये कि हिन्दी के हितैषी भारतीय, गोरी चमड़ी वाले प्राध्यापकों के प्रति अतिरिक्त भक्तिभाव का प्रदर्शन करते हैं। यह बिल्कुल भी जरूरी चीज न थी और न है।
अभी कुछ दिन हुए मुझे हिन्दी साहित्य [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>-डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, यू.के.</p>
<p>मुझे चालीस वर्षों से हिन्दी भाषा और साहित्य को पढ़ाते हुए जो एक बात बेहद अखरती रही, वो ये कि हिन्दी के हितैषी भारतीय, गोरी चमड़ी वाले प्राध्यापकों के प्रति अतिरिक्त भक्तिभाव का प्रदर्शन करते हैं। यह बिल्कुल भी जरूरी चीज न थी और न है।</p>
<p>अभी कुछ दिन हुए मुझे हिन्दी साहित्य संबंधित एक उत्सव में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जो बड़ा अच्छा लगा सिवाय इसके कि उत्साही संयोजक ने घोषणा की कि वे हिन्दी कथा साहित्य में एक &#8216;बुकर&#8217; के समकक्ष पुरस्कार की स्थापना की कल्पना कर रहे हैं। इस घोषणा से मेरे मन में मिली-जुली प्रतिक्रिया हुई। जो चीज मुझे अखरी, वह यह कि &#8216;बुकर&#8217; की परम्परा की ही नकल हिन्दी साहित्यकार क्यों करें। क्या यह जरूरी है कि हम पुरस्कार की परम्परा पश्चिम से ही लें। ऐसा क्या है पश्चिमी परम्परा में जिसकी नकल किए बिना हम &#8216;सरवाईव&#8217; नहीं कर सकते।</p>
<p>मेरे लिए यह कभी बड़े उत्साह का विषय नहीं रहा कि बालीवुड को हालीवुड की फिल्मों के उत्सव में पुरस्कार के लिए होड़ लेना इतना जरूरी हो जाये कि न मिलने पर एक क्षोभ की स्थिति फैल जाए। मुझे याद है जब &#8216;लगान&#8217; फिल्म को हालीवुड के आस्कर में पुरस्कार नहीं मिला तो मुंबई में एक निराशा का वातावरण बन गया। ऐसा क्यों होता है? क्यों हमें जरूरी लगता है कि पश्चिम का हाथ हमारी पीठ पर होना आवश्यक है। बालीवुड आज महान शक्ति में एक इयत्ता बन गया है। वह संसार में धूम मचा रहा है, वह भी बिना आस्कर का कोई पुरस्कार जीते। तो क्या जरूरी है कि हम उसकी ओर ललचाई आंखों से देखते रहें। क्या जरूरी है कि हमें हिन्दी साहित्य की गरिमा को ऊपर तक पहुंचाने के लिए एक बुकर जैसे पुरस्कार की जरूरत हो। बिना हिन्दी बुकर के भी प्रवासी हिन्दी साहित्य काफी पनप रहा है, विकसित हो रहा है, अपनी उचित मान्यता पा रहा है और उसको पश्चिमी हाथ की जरूरत नहीं है।</p>
<p>थैंक यू&#8230;मुझे चालीस वर्षों से हिन्दी भाषा और साहित्य को पढ़ाते हुए जो एक बात बेहद अखरती रही, वो ये कि हिन्दी के हितैषी भारतीय, गोरी चमड़ी वाले प्राध्यापकों के प्रति अतिरिक्त भक्तिभाव का प्रदर्शन करते हैं। यह बिल्कुल भी जरूरी चीज न थी और न है। इसमें कोई शक नहीं कि पश्चिमी विद्वानों ने हिन्दी साहित्य की गरिमा में जो अपनी सेवाएं अनुसंधान और व्याकरण आदि क्षेत्रें में दी हैं, जो कुछ अपना अतिरिक्त जोड़ा है, वह हिन्दी साहित्य की स्थाई धरोहर है। हिन्दी के एक पुत्र के नाते मुझे ऐसे विद्वानों के प्रति बड़ा गर्व है, आदर है। किंतु, मेरा सिर दर्द से फटने लगता है जब उन गोरी चमड़ी के प्राध्यापकों के प्रति अतिशय भक्तिभाव दिखाया जाता है, ऐसे प्राध्यापकों के प्रति भी, जो शायद दो पृष्ठ भी बिना हिन्दी-अंग्रेजी कोष की सहायता के नहीं लिख सकते। ऐसी गोरी चमड़ी वाले कुछ पंक्तियां जोड़ लेते हैं और उन्हें महाकवि के रूप में देखा जाने लग जाता है।<br />
यह सब मुझे बिल्कुल अनावश्यक लगता है। 1999 में लन्दन में हुए, हिन्दी समिति के द्वारा आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में यह बात साबित हो गई है कि बिना ऊपरी तामझाम के भी बड़े पैमाने पर महान सम्मेलन का आयोजन सफलता पूर्वक किया जा सकता है। मेरे लिए वह सम्मेलन तमाम हिन्दी विश्व सम्मेलनों से अधिक ऐतिहासिक महत्व का रहा है। मैं खुद कई सम्मेलनों में शामिल हो चुका हूं, इसलिए यह बात कह रहा हूं।</p>
<p>अभी मुझे दिल्ली में अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव में भाग लेने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में होने के नाते मुझे कितने ही अन्तरराष्ट्रीय उत्सवों में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त होता रहा है। किन्तु दिल्ली का 12-13-14 जनवरी का यह सम्मेलन इतनी गहराई से हिन्दी भाषा और साहित्य में पैठ करने वाला लगा, जिसकी और कोई मिसाल नहीं है। तीन दिनों में गोष्ठियाेंं पर गोष्ठियों में भाग लेने के बाद जब रात मैं होटल में पहुंचता तो बिस्तर में घुसते ही बेहद थकान से गहरी नींद एक क्षण में आ जाती। दूसरे दिन जब सम्मेलन की उपलब्धियाें के बारे में सोचता तो मन इस आशा से भर जाता कि सचमुच हिन्दी भाषा और साहित्य विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ने के लिए पूर्णत: तैयार है, वह भी संपूर्ण क्षमता के साथ। और यह महसूस करते ही मेरी आंखों में जो भविष्य दिखता उससे मुझे यह लगता कि मैं कितना भाग्यशाली हूं कि ऐसी भाषा मेरी मातृभाषा है।</p>
<p>मुझे इस सम्मेलन के कुछ ही दिन बाद लंदन जाना पड़ा, जहां मुझे एक पुरस्कार मिला। पर पुरस्कार से ज्यादा मुझे वह क्षण और अधिक मूल्यवान लगा जब उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष माननीय सोम ठाकुर जी ने मंच पर कहा कि मैं सत्येन्द्र जी को आमंत्रित कर रहा हूं, प्रवासी हिन्दी भाषा और साहित्य पर कुछ बोलने के लिए। मैं इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। फिर भी कोई बीस मिनट बोल गया, और जब बोल चुका तो हिन्दी की महान विभूतियों ने, जो वहां पुरस्कार ग्रहण कर बैठ चुके थे और जो मेरे लिए सदा माननीय रहे हैं- आदरणीय रामदरश मिश्र, आदरणीय त्रिभुज सिंह जी, सांसद सदस्य भाई कन्हैया लाल नन्नदन, आदरणीय डा. प्रभाकर श्रोत्रिय, नौटियाल और अन्य साहित्यकारों ने मुझे गले लगाया।<br />
मुझे ऐसा लगा कि वो मुझे ही गले नहीं लगा रहे, बल्कि प्रवासी हिन्दी भाषा और साहित्य को भी गले लगा रहे हैं, उसकी पहचान को जता रहे हैं। तो ऐसा है हिन्दी का संसार जिसका एक छोटा अंश प्रवासी हिन्दी संसार भी है। उसके एक सदस्य के नाते मैं यह महसूस करता हूं कि आज हम सब जहां पहुंचे हैं और कोशिश कर रहे हैं, वह है विदेश में हिन्दी की सेवा में हर भारतीय लेखक का योगदान। हर हिन्दी अध्यापक, साहित्यकार ने पूरी ईमानदारी और पूरी क्षमता के साथ हिन्दी के महासागर में अपने योगदान की एक-एक बूंद समर्पित की है। यह वह समय है जब हमें हिन्दी की उपलब्धियों का जश्न मनाना है और साथ ही अपने पास जो भी सर्वोत्तम है, उसे हिन्दी के चरणों में अर्पित करना है।</p>
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		</item>
		<item>
		<title>कविता - विश्व हिन्दी सम्मेलन पर</title>
		<link>http://www.purwai.com/?p=76</link>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2008 11:35:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[कविता]]></category>

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		<description><![CDATA[(ओसाका, जापान से डा. यासमीन सुलताना नकवी की कविताएं)
आओ, फिर से आओ
आओ-आओ अमीर खुसरो
स्वतन्त्र भारत को
फिर से नूतन वाणी दो
आवश्यकता है
तुम्हारे चिंतन की
मनमंथन की
हृदय के धड़कन की
तुम्हारे हृदय में फिर
धधक उठे तीव्र ज्वाला
रच दो कोई भजन
राम, रहीम रस वाला
फ्गोरे-गोरे मुखड़े पे
श्याम चदरिया ओढे
सोए सुरवालाय्
झूम के हर कोई गाए
पीकर प्रेम-भक्ति का प्याला,
हो मतवाला
कहां हो आओ
रास्ता उलझा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>(ओसाका, जापान से डा. यासमीन सुलताना नकवी की कविताएं)</p>
<p>आओ, फिर से आओ<br />
आओ-आओ अमीर खुसरो<br />
स्वतन्त्र भारत को<br />
फिर से नूतन वाणी दो<br />
आवश्यकता है<br />
तुम्हारे चिंतन की<br />
मनमंथन की<br />
हृदय के धड़कन की<br />
तुम्हारे हृदय में फिर<br />
धधक उठे तीव्र ज्वाला<br />
रच दो कोई भजन<br />
राम, रहीम रस वाला<br />
फ्गोरे-गोरे मुखड़े पे<br />
श्याम चदरिया ओढे<br />
सोए सुरवालाय्<br />
झूम के हर कोई गाए<br />
पीकर प्रेम-भक्ति का प्याला,<br />
हो मतवाला<br />
कहां हो आओ<br />
रास्ता उलझा है बाबा कबीर<br />
नागफनियां उगी हैं डगर-डगर<br />
नहीं कोई कहीं अबीर<br />
अब आ जाओ<br />
अपनी वाणी लेकर<br />
तुम तो हो वाणी के नायक<br />
आओ अपनी<br />
प्रखर वाणी लेकर<br />
जगाओ एक अलख<br />
जगे जगत जीवन भर<br />
चल पड़ें सभी छोटे-बड़े<br />
हिन्दी की डगर पर ।<br />
क्यों है उलझन<br />
चलो आओ एक बार ठान लो<br />
जागने और जगाने को<br />
बहुत दिनों से सोए हैं हम<br />
नहीं वक्त और घड़ी गंवाने को<br />
बार-बार मारी गई,<br />
कत्ल हुआ हिन्दी का<br />
लिखित नहीं मौखिक नहीं<br />
सच्चा रंग लौटा दो हिन्दी का<br />
सत्य है सभ्यता है<br />
अपनी वाणी में<br />
जैसे मां और बाप<br />
क्यों है उलझन हमको हिन्दी से,<br />
यह बहुत बड़ा है अभिशाप<br />
एक स्वर से स्वराज की<br />
गूंज उठी थी हिन्दी में<br />
आजाद हुआ देश,<br />
उड़ा दी धज्जी<br />
हिन्दी की हिन्दी में<br />
बहुत देर नहीं<br />
जब बतायेगा कोई दूसरा<br />
हम क्या हैं,<br />
क्या है संस्कृति<br />
और संस्कार हमारा<br />
एक प्रश्न खड़ा है<br />
रावण सा प्रत्यक्ष<br />
इसका उत्तर कैसे मिले,<br />
बताए कौन है अध्यक्ष<br />
जम्मू कश्मीर और कन्याकुमारी<br />
का किसान<br />
करता है कैसे आपस में<br />
संवादों का आदान-प्रदान।</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>लेख - डायसपोरा में हिन्दी साहित्य-रचना</title>
		<link>http://www.purwai.com/?p=74</link>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2008 11:34:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[लेख]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.purwai.com/?p=74</guid>
		<description><![CDATA[-सुषम बेदी, यू.एस.ए.
बात यह है कि विदेशी भारतीयों को रचनात्मक कर्म के लिये नयी भावभूमि तो सहज ही हासिल हो गयी है पर उसकी अभिव्यक्ति का कलात्मक पक्ष अभी भी कमजोर है। जब तक इस दिशा में न केवल नयी भावभूमियों की तलाश, बल्कि उस तलाश के साथ अभिव्यंजना के नये दरवाजे न खोले जायें, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>-सुषम बेदी, यू.एस.ए.</p>
<p>बात यह है कि विदेशी भारतीयों को रचनात्मक कर्म के लिये नयी भावभूमि तो सहज ही हासिल हो गयी है पर उसकी अभिव्यक्ति का कलात्मक पक्ष अभी भी कमजोर है। जब तक इस दिशा में न केवल नयी भावभूमियों की तलाश, बल्कि उस तलाश के साथ अभिव्यंजना के नये दरवाजे न खोले जायें, नये सिक्के न गढ़े जायें, नये मुहावरे न खोजे जायें, तब तक गर्वोक्तियां खोखली ही बजेंगी।</p>
<p>लोग यहां धड़ाके से लिख तो रहे हैं। दायें-बायें किताबें भी खूब निकल रही हैं। पैसे की गर्मी है न&#8230; और पैसा है तो जितना चाहो भारत से किताबें छपवा लो। तो फिर विश्व के सबसे धनी देश के वासियों के पास किताबें छपवाने की दिक्कत क्यों हो?</p>
<p>पर क्या जो छप जाता है वह साहित्य बन जाता है? अखबार भी तो रोज सैंकड़ों छपे कागज निकाल डालते हैं। उन्हीं को पुस्तक रूप में बांध दें तो बहुत से लोग उनके साहित्य होने का भ्रम जरूर पाल लेंगे। इसीलिये साहित्य की रक्षा की जरूरत आ पड़ी है कि छपने-छपाने की भीड़ में वह कहीं खो न जाये। चूंकि पैसा कुछ ज्यादा जोर से बोलता है, इसीलिये अनजाने ही जब हम सर उठाकर देखते हैं तो पाते हैं कि साहित्य की बागडोर उन लोगों के हाथ में आ पड़ी है जो संस्थाएं बना सकते हैं, उनके खर्चीले कार्यक्रम और मेले कर सकते हैं और फिर हिंदी के नाम पर लगभग कूपमंडूक अंग्रेजी के स्थानीय अखबारों में अपनी खबरें छपवा सकते हैं। इन अखबार वालों को हिंदी साहित्य क्या है, इसका अंदाज तक नहीं, सो आप जिस किसी का नाम ले दें, वह साहित्यकार मान लिया जाएगा। इन्होंने ज्यादा से ज्यादा अगर किसी हिंदी साहित्यकार का नाम सुना होगा तो प्रेमचंद का। अखबारों की अपनी जरूरतें रहती हैं। उनको आप विज्ञापन देते-दिलवाते रहिए, वे आपके बारे में छापते रहेंगे।</p>
<p>यह बात नहीं कि हिंदी वालों में प्रतिभा नहीं। बात यह है कि जिनमें प्रतिभा होती है वे चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। न उनके पास मेले करने का वक्त होता है और न उनमें भाग लेने का। अगर भाग ले भी लें तो धक्कम-धक्की में उनका कुछ जाता ही है, हासिल नहीं होता। इसलिये मेलेबाजी से खुद को दूर रखके काम करते रहना एक तरह से उनका चुनाव और मजबूरी दोनों ही होती है।</p>
<p>बाकी कुछ प्रतिभावाले लोग अगर मेलेबाजी में पड़ जाते हैं तो फिर उनका सारा वक्त इसी में गुम हो जाता है। कुछ झूठ-मूठ का नाम जरूर कमा लेते हैं पर ठोस लेखन के नाम पर खास कुछ होता नहीं उनके पास।</p>
<p>बात यह है कि लेखन के लिये तो साधना की, तपस्या की जरूरत होती है। भागते-दौड़ते, चलते-फिरते गंभीर लेखन नहीं होता। उसके लिये टिकाव और अध्ययन-मनन चाहिये। आपने अगर पढ़ना छोड़ दिया तो फिर लेखन में भी गंभीरता और गहनता कैसे आयेगी? अगर काम धंधों की भीड़ में सोचने का वक्त नहीं तो सोच से खाली साहित्य किस काम का?</p>
<p>अगर अपने भीतर झांक कर अपनी भावराशि को मथने, परखने, महसूस करने की फुर्सत नहीं तो क्या खाक लिखेंगे आप!</p>
<p>यूं मेलेबाजी की भी अपनी एक जगह है, इसे मैं नकारती नहीं। लेखक समाज का सदस्य है और साहित्य एक सामाजिक कर्म है। चाहे उसे एकांत में बैठकर लिखा जाये या भरे-पूरे घर-परिवार के बीच, है तो वह पाठकों के लिये ही। इसलिये अगर लोग मिल-बैठ कर साहित्य चर्चा करें तो साहित्य का आस्वादन भी होता है और अच्छे-बुरे साहित्य की पहचान का भी मौका लगता है। इन दृष्टियों से मेलों की अपनी अहमियत है। पर मेले अगर इसी उद्देश्य से किये जायें कि अपनी ओर ध्यान आकर्षित करना है, न कि श्रेष्ठ साहित्य की चर्चा और परख-पहचान। तो ऐसी स्थिति में वह कुछ लोगों की अपनी गर्वोक्तियों और ढिंढोरेबाजी से ज्यादा कुछ और नहीं हो पाता।</p>
<p>इधर हाल ही में छपे हुए कुछ लेख पढ़ते हुए ऐसी ही गर्वोक्तियां और नारेबाजी मेरी नजर में आयीं&#8230; इंगलैण्ड के लेखक भारत के हिन्दी लेखकों से कमतर नहीं। यहां भी वैसा ही उच्चकोटि का साहित्य लिखा जा रहा है जैसा कि भारत में&#8230;। मैं चौंकी। किन भारतीय लेखकों से मुकाबला किया जा रहा है इन ब्रितानी हिंदी लेखकों का? भारत में भी तो हर तरह के लेखक हैं? घटिया से घटिया और श्रेष्ठ से श्रेष्ठ! क्या है कोई इंग्लैंड में जिसे आप मुक्तिबोध के साथ बिठा सवेंफ, या रेणु और श्रीलाल शुक्ल के कथा साहित्य की श्रेणी दे सवेंफ? अगर मेडियोकर लेखकों से ही मुकाबला करना है तो कुछ भी कह कर खुश हो लीजिये! इसी तरह से खुद को तसल्ली देते रहिये या इस आत्मप्रवंचना के जरिये अपनी लेखकीय हस्ती को संपुष्ट करते रहिये।</p>
<p>मैं यह कहती हूं कि ऐसी आत्मप्रवंचना या गर्वोक्तियों की जरूरत क्या है? अब या तो ब्रितानी भारतीय उस ग्रंथि के शिकार हैं जिसके तहत गोरे ब्रितानियों ने खुद को हमेशा दूसरी जातियों से बेहतर घोषित किया और जबरदस्ती या चालाकी से सबसे यह मनवाने की कोशिश की। साथ ही दूसरों की श्रेष्ठता को नजरंदाज किया। आत्मविश्वास अच्छी बात है। लेकिन मात्र आत्मविश्वास अच्छा साहित्य तो नहीं दे सकता।</p>
<p>मैं यह भी नहीं कहती कि ब्रिटेन और अमरीका में लिखा जाने वाला सारा हिंदी साहित्य हीनता ग्रंथि से ग्रस्त रहे और अपनी स्वीकृति के लिये भारत का ही मुंह जोहता रहे। पर अपनी गर्वोक्तियां सुनाने से पहले अपने गिरेबां में भी तो झांक लेना जरूरी है।</p>
<p>बात यह है कि विदेशी भारतीयों को रचनात्मक कर्म के लिये नयी भावभूमि तो सहज ही हासिल हो गयी है पर उसकी अभिव्यक्ति का कलात्मक पक्ष अभी भी कमजोर है। जब तक इस दिशा में न केवल नयी भावभूमियों की तलाश, बल्कि उस तलाश के साथ अभिव्यंजना के नये दरवाजे न खोले जायें, नये सिक्के न गढ़े जायें, नये मुहावरे न खोजे जायें, तब तक यह गर्वोक्तियां खोखली ही बजेंगी। मैं यह पूछना चाहूंगी कि क्या कोई प्रेमचंद हुआ है जिसने कथा साहित्य को कोई नया मोड़ दिया हो, कोई वात्स्यायन हुआ है जिसने पहले वाली धाराओं पर बांध लगा कर अपने लिये नये रास्ते बनाने की साहित्य की मौलिक परिभाषा को रेखांकित किया हो। निर्मल वर्मा, राकेश, रेणु या सोबती जिन्होंने अपनी रचनाओं के साथ-साथ अपनी भाषा की भी खोज की, उसे संवारा-निखारा, नये रंग, भाव, बिम्ब दिये। क्या ऐसे कोई यहां हुआ?</p>
<p>मुझे लगता है कि अभी हम नयी भाषा की रचना नहीं कर पाये। जो हिन्दी का नमूना भारत के हिंदी साहित्यकार हमें पकड़ा गये हैं उसी से गुजारा चला रहे हैं।<br />
इस भाषा में एक बासीपन है, जिसे प्रेंफच भाषा में &#8216;देजा वु&#8217; कहते हैं। यानि कि पहले से देखा, जाना हुआ। ऐसा महसूस होता है। भाषा की ताजगी किसी भी नये रचनाकर्म की अंदरूनी जरूरत है। यूं कहीं-कहीं नये भाव-बिम्ब दिख भी जाते हैं जो विदेश के संदर्भों से ही उठे हैं, लेकिन बहुत कम। अंग्रेजी में लिखने वाले ऐशियाई लेखकों ने भाषा का भारतीयकरण करके अपनी अंग्रेजी को नयापन दिया है जो भारत में भी हो रहा है, मात्र डायसपोरा में ही नहीं। किंतु, डायसपोरा के सलमान रशदी इस क्षेत्र में अग्रणी हैं। इसलिये यह श्रेय मैं उन्हीं को दूंगी। बाद में तो अरुंधती राय और कई दूसरे लेखकों ने भी भाषा में ताजगी भरने का यह तरीका अपनाया है।<br />
क्या हिंदी के लेखकों के लिये यह रास्ता हिंदी के अंग्रेजीकरण की दिशा में होगा? यह सवाल आपत्तिजनक और विवादास्पद हो सकता है। बहुत से सुधीजन मेरे इस सुझाव पर पत्थर बरसायेंगे। मैं यह नहीं कह रही कि आप अंग्रेजीकरण के माध्यम से ही साहित्य की भाषा का परिष्कार करें। पर अगर कोई शब्द एक बिम्ब लेकर आ ही जाता है तो उसका परिहार करने की भी जरूरत नहीं है।</p>
<p>भारत में तो हिंगलिश जैसी भाषाएं भी चल पड़ी हैं। पर वे मीडिया की भाषा हैं, साहित्य की नहीं। इसी तरह अमरीका में भारतीय मूल की युवा पीढ़ी द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी की भी अलग रंगत बन रही है। उसमें अमरीकी अंग्रेजी का पुट तो है ही ; साथ ही अमरीकी मुहावरे भी अनूदित होकर चले आते हैं। लेकिन कालेजों, यूनिवर्सीटीयों में हिन्दी सीखे हुए युवा भाषा का शुध्द रूप ही बरतते हैं।<br />
इससे हिंदी को लाभ-हानि दोनों ही है। एक तरफ हिंदी उन सब तक पहुंच रही है जो अन्यथा अंग्रेजी के कार्यक्रम ही सुनते-देखते। वहीं हिंदी के इस अपभ्रंश रूप को शिष्ट वर्ग की स्वीकृति मिल रही है। देखा जाये तो हिंदी का जन्म संस्कृत के एक अपभ्रंश के रूप से ही हुआ था। सो यह विकास का एक सहज क्रम मान कर स्वीकार किया जा सकता है। अंतत: इसका क्या रूप होगा यह भविष्य ही बतलायेगा। क्या हिंगलिश और तथाकथित शुध्द हिंदी या साहित्यिक हिंदी दो अलग भाषाएं हो जायेंगी या कहीं मिल मिलाकर एक रूप बनाये रखेंगी, कहा नहीं जा सकता। हां भाषा विज्ञान के इतिहास के आधार पर यह अटकल जरूर लगायी जा सकती है कि शायद वे दो अलग भाषाएं हो जायेंगी, जैसे कि फिजी की पिजिन हिंदी। हिंदी से समानता रखते हुए भी यह भाषा पूरी तरह से हिंदी नहीं कहला सकती। इसी तरह हिंग्लिश भी हिंदी नहीं कहला पायेगी, उसकी एक शाखा भर ही हो पायेगी।</p>
<p>हिंदी के विकास को रोकना हमारे बस की बात नहीं। न ही इसे रोकना चाहिये। संस्कृत को बचाने की बहुत कोशिश पाणिनी ने की लेकिन उसके रूपांतरण को रोक नहीं पाये। संस्कृत आज भी हमारे बीच है। इसी तरह हिंदी का शुध्द रूप भी संभव है बरसों बना रहे। हिंदी को अगर बांध दें तो उसका विकास रुक जायेगा। यहीं हिंदी को लेकर उर्दू का सवाल भी उठ जाता है। कितने फारसी शब्द स्वीकार्य हैं, कितने नहीं। कौन सा स्वीकार्य है कौन सा नहीं। इस तरह के बहुत से मसले उठते हैं जिन पर मैं किसी और लेख में बात करूंगी।</p>
<p>मूल बात ईमानदारी की है। भाषा का इस्तेमाल करने की ईमानदारी। यानी कि घिसे-घिसाए प्रयोगों को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने की बजाय ऐसे शब्दों का चुनाव हो जो सचमुच उस भाव या विचार को वहन कर सवेंफ जो कि लिखने वाले के मन में आया है। इसी तरह बात विधाओं की भी है- प्रसाद कामायनी लिख गये और मैं भी एक काव्य ग्रंथ लिखकर प्रसाद जैसी ख्याति पाना चाहता हूं- ऐसे विचार के बहुत लोग यहां हैं और हर जगह हैं। लेकिन लोग भूल जाते हैं कि प्रसाद को कामायनी लिख कर जो मिला वह इसलिये क्योंकि वह उनकी खोज थी। किसी और की खोज को वे अपने अहम् की तुष्टि के लिये नहीं गढ़ रहे थे।</p>
<p>अब जरा पुरस्कारों की बात भी कर ली जाये। इधर प्रवासी भारतीयों को साहित्यिक योगदान पर पुरस्कार प्रदान भी किये जाने लगे हैं। यह काम बहुत प्रशंसनीय है। रचनाकारों को प्रोत्साहन भी मिलेगा इससे। लेकिन किसी साहित्य क्षेत्र में कितने पुरस्कार दिये जाते हैं, इस बात से साहित्य की श्रेष्ठता साबित नहीं होती। बहुत बार इससे श्रेष्ठ कृतियों की पहचान की घोषणा होती है जो कि स्पृहणीय कर्म है। यह भी प्रमाणित होता है कि साहित्य कर्म की उस समाज विशेष में प्रतिष्ठा है, आदर है। लेकिन बहुत बार पुरस्कार श्रेष्ठ कृतियों की अवहेलना भी कर जाते हैं और एक बार पुरस्कार की परंपरा स्थापित हो जाये तो किसी वर्ष श्रेष्ठ कृति के उस वर्ष न होने पर भी पुरस्कार देने के लिये किसी का चुनाव मजबूरी हो जाती है। फिर चुनाव मंडल के हर तरह के पक्षपात या व्यक्तिगत रुचियां इस चयन पर असर करती हैं। पुरस्कार कृति को ही मिले या समग्र कर्म को, ऐसे भी बहुत से सवाल विवादास्पद हैं।</p>
<p>कहना मैं यह चाहती हूं कि किसी भी भाषा के साहित्य कर्म की श्रेष्ठता को पुरस्कारों की गिनती से निर्धारित नहीं किया जा सकता। बहुत सी संस्थायें आजकल इस कर्म में प्रवृत्त हैं। कुछ हद तक पुरस्कार प्रदान कर वे साहित्य के क्षेत्र में अपनी जगह बनाना चाहती हैं। पर इससे वे साहित्य कर्म की श्रेष्ठता को साबित नहीं कर सकतीं।<br />
बात यह है कि एक ओर तो प्रवासी भारतीय श्रेष्ठतर लेखक, या कहिये कि किसी से कमतर लेखक न होने का दंभ भरते हैं, दूसरी ओर यह भी दरखास्त की जाती है कि चूंकि प्रवासी भारत के बारह बैठ कर लिख रहा है, तो उसके लिये साहित्य के मानदंड कुछ कमजोर कर दिये जायें। यह उसी तरह की बात है जैसे कि किसी को मंडल कमीशन की सिफारिश दिलाने की जरूरत हो। अगर ऐसा किया भी जाये तो क्या इससे यह साबित नहीं होता कि प्रवासी साहित्य चाहे दोयम श्रेणी का ही क्यों न हो, उसे साहित्य की दुनिया में सुरक्षित स्थान की जरूरत है।</p>
<p>शायद इसी डर की वजह से मैं कहना चाहती हूं कि हमारे साहित्य को ही, हमारी अभिव्यक्तियों को ही यह साबित करना है कि हम कहां हैं, कितने पानी में हैं। न तो हमारी गर्वोक्तियां यह साबित कर सकती हैं, न ही याचनायें।</p>
<p>फिर हम कैसे कह सकते हैं कि भारतीय हिंदी लेखकों से हम कम नहीं। अभी हमारी यात्र बहुत लंबी है। पड़ाव दूर है। अगर हम आगे बढ़ते चले जाना चाहते हैं, बेहतर होते चले जाना चाहते हैं। हमें भी मुक्तिबोध पैदा करने हैं, निराला और प्रेमचंद के लिये जमीन तैयार करनी है, तो आत्मप्रशंसा, आत्मप्रवंचना, हमारा रास्ता बीच में ही रोक देगी। हमें लगातार आत्मान्वेषण की जरूरत है, आत्मविश्लेषण की जरूरत है, अपने आप को झुठलाने, बहलाने की नहीं! अपनी आलोचना, अपनी नुक्ताचीनी, अपना आलोड़न, अपना परीक्षण और अपना परिष्कार करते हुए ही हम साहित्य संसार को श्रेष्ठ रचनायें दे सकते हैं।</p>
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		<title>लेख - शोषण के लिए प्रस्तुत लेखक</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2008 11:30:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[लेख]]></category>

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		<description><![CDATA[-डा. गौतम सचदेव, यू.के.
पैसे देकर छपने वाले लेखक एक ओर प्रकाशकों को अधिकाधिक शोषक बना रहे हैं, तो दूसरी ओर स्वयं अपना अवमूल्यन करवा रहे हैं। उधर प्रकाशक और लेखक के सामने पाठक बेबस हैं, जिन्हें अच्छे साहित्य के स्थान पर अधिकतर बेकार की चीजें पढ़ने को मिल रही हैं।
प्रकाशकों द्वारा लेखकों का शोषण किये [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>-डा. गौतम सचदेव, यू.के.</p>
<p>पैसे देकर छपने वाले लेखक एक ओर प्रकाशकों को अधिकाधिक शोषक बना रहे हैं, तो दूसरी ओर स्वयं अपना अवमूल्यन करवा रहे हैं। उधर प्रकाशक और लेखक के सामने पाठक बेबस हैं, जिन्हें अच्छे साहित्य के स्थान पर अधिकतर बेकार की चीजें पढ़ने को मिल रही हैं।</p>
<p>प्रकाशकों द्वारा लेखकों का शोषण किये जाने की महागाथा में अब एक अद्भुत मोड़ आया है। अब लेखक शोषित होने के लिए प्रकाशकों के पीछे दौड़ रहे हैं। एक जमाना था जब लेखक प्रकाशक से अपनी पुस्तक की रायल्टी मांगा करते थे, लेकिन अब अनेक लेखकों की छपने की प्यास इतनी बढ़ गई है कि इसे शान्त करने के लिए वे प्रकाशकों को मुंह मांगे पैसे देते हैं। इनमें भी जो लेखक सम्पन्न हैं और विशेष रूप से विदेशों में रहते हैं, सुना है वे प्रकाशकों को पैसे देने में और भी उदार हो रहे हैं। इससे प्रकाशकों को पुस्तक का प्रचार करने और उसे बेचने की कोई चिन्ता नहीं रही। यही नहीं, चूंकि उन्हें लेखकों को रायल्टी भी नहीं देनी पड़ती, इसलिए उनकी न हींग लग रही है, न फिटकरी और लाभ के रूप में रंग भी चोखा होता जा रहा है।</p>
<p>हाल ही में अपनी भारत यात्र के दौरान मुझे दिल्ली में एक जानकार सज्जन ने बताया कि ब्रिटेन के कुछ लेखक प्रकाशकों को बुरी तरह बिगाड़ रहे हैं। वे बोले, चूंकि एक ब्रितानी पाउंड की विनिमय-दर लगभग अस्सी-पचासी रुपये है, इसलिए ये लेखक थोड़े-से पाउंड खर्च करके धड़ा-धड़ छप रहे हैं। जब मैंने उन्हें याद दिलाया कि आज अन्य प्रवासी लेखकों की तुलना में ब्रिटेन के लेखकों की पुस्तवेंफ सबसे ज्यादा छप रही हैं, तो वे बोले- इससे क्या फर्क पड़ता है, उनमें उच्च स्तर की तो गिनी-चुनी ही हैं और फिर, उन पुस्तकों की क्या महत्ता, जिनमें अधिकतर पैसे देकर छपती हैं। उनका कहना था कि इन लेखकों ने हिन्दी साहित्य के प्रकाशन को एक गन्दा व्यवसाय बना दिया है। मैंने उनकी बात को अस्वीकार करते हुए कहा कि सारा दोष ब्रितानी लेखकों के मत्थे मढ़ना गलत है। साहित्य को इस स्थिति तक पहुंचाने में भारतीय और प्रवासी लेखक, प्रकाशक, समाज और व्यवस्था सभी दोषी हैं। लेकिन उन सज्जन की बात में भी वजन था। पैसे देकर छपने वाले लेखक एक ओर प्रकाशकों को अधिकाधिक शोषक बना रहे हैं, तो दूसरी ओर स्वयं अपना अवमूल्यन करवा रहे हैं।</p>
<p>उधर प्रकाशक और लेखक के सामने पाठक बेबस हैं, जिन्हें अच्छे साहित्य के स्थान पर अधिकतर बेकार की चीजें पढ़ने को मिल रही है। प्रकाशक प्राय: कहते हैं कि हिन्दी की पुस्तवेंफ बिकती नहीं हैं, क्योंकि खरीदकर पढ़ने वाले पाठकों की संख्या नगण्य है। लेकिन, जो लोग अच्छा साहित्य पढ़ना चाहते हैं और खरीदने को तैयार हैं, प्राय: उन्हें वह उपलब्ध नहीं होता। प्रकाशक वही पुस्तवेंफ छापते और बेचते हैं, जिनसे उन्हें लाभ हो और इधर जबसे लेखक उन्हें पैसे देने लगे हैं, तबसे वे अच्छा साहित्य छापने में और भी कम रुचि दिखाते हैं। फिर, चूंकि हिन्दी में उचित और निष्पक्ष समीक्षा करने वाले गिने-चुने समीक्षक हैं और अधिकतर लेखकों एवं प्रकाशकों को न तो ऐसी समीक्षा अच्छी लगती है और न ही उन्हें इसकी जरूरत है, इसलिए पाठकों का अच्छे साहित्य से वंचित होना स्वाभाविक है।</p>
<p>मेरे कहने का अभिप्राय यह नहीं है कि प्रकाशक बेकार हैं और वे बुरे ही होते हैं। नहीं, लेखकों को समाज के सामने लाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है। प्राय: प्रकाशक ही लेखकों की छपने की इच्छा को पूरा करते हैं और उनका प्रचार-प्रसार भी करते हैं। वे साहित्य और समाज के बीच की अनिवार्य और उपयोगी कड़ी हैं। माना कि वे साहित्य जैसी पवित्र वस्तु को भी एक जिन्स समझते हैं और उसे छापते-बेचते समय नैतिक आदर्शों का पालन नहीं करते, लेकिन मत भूलिए कि वे भी अन्य व्यापारियों की तरह व्यापारी ही हैं। वे सरस्वती के उपासक नहीं हैं। काश कि वे लेखकों और उनकी रचनाओं का सम्मान कर पाते, जिनके कारण वे अपना व्यवसाय चलाते हैं। अगर प्रकाशकों से पूछें, तो वे कहते हैं कि हमारी भी परेशानियां हैं, क्योंकि आधुनिक समाज की जरूरतों और प्राथमिकताओं में साहित्य का स्थान बहुत गौण हो गया है। इंटरनेट, टेलिविजन और फिल्मों आदि की लोकप्रियता के कारण बहुत-से लोगों ने तो पुस्तवेंफ पढ़ना ही छोड़ दिया है। इन परिस्थितियों में हमें आज वह भी करना पड़ता है, जो हम पहले नहीं करते थे।<br />
साहित्य में समाज की दिलचस्पी कम हो जाने को देखते हुए सवाल उठता है कि भारतीय और प्रवासी हिन्दी लेखक किनके लिए लिख रहे हैं?</p>
<p>अगर वे पैसे देकर छप रहे हैं, तो सिवाय इसके कि उनकी छपास पूरी हो रही है और उनके अहं की तुष्टि हो रही है, उन्हें और क्या मिल रहा है? माना कि छपना लेखक की बहुत बड़ी उपलब्धि है, लेकिन छप जाने से ही कोई लेखक बड़ा नहीं बन जाता। बड़ा वह है, जिसका साहित्य स्थायी महत्व का है तथा आलोचक और पाठक जिसे बड़ा समझते हैं। सत्साहित्य दैनिक समाचारपत्र की तरह केवल घंटे-दो-घंटे की सनसनी पैदा करने के लिये नहीं होता, बल्कि दीर्घकाल तक विचारोत्तेजक और चित्ताकर्षक बना रहता है तथा उसे संजोकर रखने और दुबारा पढ़ने को जी चाहता है। सत्साहित्य समाज की बौध्दिक बपौती है, लेकिन ऐसा साहित्य न तो रोज लिखा जाता है और न ही हर रचना कालजयी होती है।</p>
<p>अगर पैसे देकर छपने की बात को थोड़ी देर के लिए छोड़ दें, तो भी आज जो कुछ छप रहा है, वह अधिकतर साधारण स्तर का है। लेखक न तो आत्मालोचन और अध्ययन करते हैं और न ही अभ्यास। आज लेखक तो सैकड़ों विद्यमान हैं, लेकिन साहित्यकार कहलाने वाले बहुत कम हैं। सस्ती वाहवाही लूटने वालों की कतार में लेखक भी शामिल हैं। कोई अपने मुंह मियां मिट्ठू बनकर शोर मचा रहा है और प्रसिध्दि लूट रहा है, तो कोई सलाम-साधक या सम्पर्क-साधक बनकर सम्मान और पुरस्कार हथिया रहा है, लेकिन बुध्दिजीवी होने के नाते ये लेखक क्या कभी सोचते हैं कि वे समाज को किधर ले जा रहे हैं? कुछ लेखक कह सकते हैं कि हमें समाज अब न तो बौध्दिक मार्गदर्शक समझता है और न ही चिन्तक या विचारक। यह बात आंशिक रूप से सत्य होने पर भी लेखकों से पूछा जा सकता है कि क्या वे प्रकाशकों को सिर पर चढ़ाकर और ज्यादा शोषक नहीं बना रहे? लेखक कहेंगे कि जब प्रकाशक हमें छापते ही नहीं, तो हम और क्या करें? सौभाग्य से कुछ ऐसे ईमानदार प्रकाशक अब भी मौजूद हैं, जो रचना के स्तर को पैसों से अधिक महत्व देते हैं, लेकिन सोचिए, कल को अगर सारे प्रकाशक लेखकों से पैसे मांगने लगेंगे, तो क्या होगा?</p>
<p>इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज के लेखक भी प्रकाशकों से उतने ही परेशान हैं, जितने पुराने लेखक थे। इनमें वे लेखक सबसे अधिक परेशान और उपेक्षित हैं, जिनके पास न तो छपने के लिए पैसे हैं, न ही साधन या सम्पर्क साधने की कला। वे चाहे जितने अच्छे लेखक हों, उन्हें कोई नहीं छापता। उनकी सुध लेने या उन्हें आगे लाने की न तो किसी को जरूरत है और न ही दिलचस्पी। इनसे थोड़ी बेहतर स्थिति उन लेखकों की है, जो किसी-न-किसी तरह छप रहे हैं, लेकिन वे भी यदि बड़े-बड़े साहित्यकारों, आलोचकों, सम्पादकों, अकादमियों और उच्च पीठाधीशों से जोड़-तोड़ नहीं कर पा रहे, तो छपने के बाद भी हाशिये पर पड़े हुए हैं। उधर सलाम-साधक न केवल प्रसिध्दि और पुरस्कार पा रहे हैं, बल्कि अच्छे और प्रसिध्द साहित्यकार भी कहला रहे हैं। ऐसे लेखकों के दोनों हाथों में लड्डू हैं।</p>
<p>आधुनिक समाज की साहित्य के प्रति चाहे जो भी धारण हो, लेकिन इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि लेखक समाज के लिए आवश्यक है और समाज लेखक के लिए। रही बात प्रकाशकों द्वारा लेखकों के शोषण की, तो यह बात कोई नई नहीं है। प्रेमचंद और निराला तक उनके शिकार हुए। तब क्या प्रकाशकों को सीख देने के लिए लेखकों को लिखना और छपना बंद कर देना चाहिए या स्वयं प्रकाशक बन जाना चाहिए? यहां ब्रिटेन में मेरे एक परिचित लेखक ने प्रकाशकों से तंग आकर कुछ समय अपनी दो पुस्तवेंफ स्वयं छपवा लीं। मैंने उनसे पूछा, क्या उन पुस्तकों की बिक्री भी आप ही कर रहे हैं? तो उनका उत्तर था- नहीं, ब्रिटेन में खरीदकर पढ़ने वाले पाठक कहां हैं। इस लिए मैंने मुद्रित मूल्य से आधे पर अपनी दोनों पुस्तवेंफ भारत के एक पुस्तक विक्रेता के पास रखवाई हैं। समस्या के इस समाधान से वे सन्तुष्ट दिखाई दिये, लेकिन जब मैंने शंका की कि आप उस पुस्तक विक्रेता से अपने पैसों की वसूली कैसे करेंगें तथा पाउंड खर्च करके पुस्तवेंफ छपवाने के बाद क्या आप उनके बदले रुपये लेना पसंद करेंगे? तो वे बगलें झांकने लगे।</p>
<p>स्वयं प्रकाशक बन जाने वाला लेखक जरूरी नहीं कि कुशल व्यवसायी भी बन जाये। ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे, जब प्रकाशक बनने वाले लेखक बाद में दुखी हुए। मुझे स्मरण है, कई दशक पूर्व दिल्ली के कुछ लेखकों ने मिलकर एक सहकारी प्रकाशन संस्थान आरम्भ किया था, लेकिन कुछ समय बाद वह बंद हो गया। उसके बंद होने के कारण तो मुझे ज्ञात नहीं, लेकिन उन कारणों की कल्पना करना मुश्किल नहीं है। लेखकों के सहकारी प्रकाशक बनने पर उनकी सबसे बड़ी समस्या होती है कि किसे पहले छापा जाये। चूंकि सहकारी प्रकाशन संस्थान निवेशकों का साझा उद्यम होता है और वे सब एक साथ छापे नहीं जा सकते, इसलिए उनमें मनोमालिन्य उत्पन्न हो जाता है। फिर, जिस लेखक को पहले छापा जाता है, यदि उसकी पुस्तक की बिक्री से लागत वसूल नहीं होती, तो शेष लेखक अगले प्रकाशन के लिए नया निवेश करना बंद कर देते हैं।</p>
<p>सहकारी प्रकाशन संस्थान बनाने के अतिरिक्त इस दिशा में कुछ और उपाय भी किये गए हैं, जैसे कुछ वर्ष पहले यू.के. हिन्दी समिति ने मेरा सुझाव मानकर हर वर्ष एक स्थानीय लेखक की पुस्तक छपवाना शुरू किया। दो-तीन पुस्तवेंफ छपवाई गईं, लेकिन अब लगता है कि व्यावहारिक और व्यावसायिक समस्याओं के भंवर में यह नैय्या भी डगमगा रही है। संस्थाएं और संगठन भी तो आखिर मनुष्य ही चलाते हैं। किसी में राजनीति का प्रवेश हो जाता है, तो किसी में सन्देहों और निहित स्वार्थों का। यदि और कुछ नहीं, तो जिस प्रकाशक से पुस्तक छववाई जाती है, उसका हिस्सा और बिक्री आदि की समस्याएं विवाद उत्पन्न करने लगती हैं। मतलब यह कि कोई-न-कोई परिस्थिति ऐसी अवश्य बन जाती है, जब आदर्श प्रतीत होने वाली योजना भी कांटों में उलझ जाती है।</p>
<p>हाल ही में भारत सरकार के तत्वावधान में लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने भी लेखकों की सहायता करने की सराहनीय योजना लागू की है। इसके अन्तर्गत प्रति वर्ष प्रवासी लेखक को उसकी पुस्तक के प्रकाशन के लिए बीस हजार रुपये की सहायता राशि दी जायेगी। आशा की जा सकती है कि इससे लेखकों की स्थिति में कुछ सुधार अवश्य होगा, लेकिन इससे भी प्रति वर्ष केवल एक लेखक का भाग्य ही तो चमकेगा। शेष का क्या होगा?</p>
<p>अन्त में एक अन्य कटु सत्य पर विचार करना भी अप्रासंगिक न होगा। प्रकाशक किसी पुस्तक की वास्तव में जितनी प्रतियां छापते हैं, यह लेखक को वे शायद ही बताते हों। अब चूंकि हिन्दी पुस्तकों के संस्करण पांच सौ के भी नहीं रहे और सुनते हैं किसी-किसी पुस्तक के तो ढाई-तीन सौ के होते हैं। ऐसे में लेखक प्रकाशक द्वारा बताई संख्या पर विश्वास न करे, तो क्या करे? चतुर प्रकाशकों ने अपनी दुकानें चलाने के लिए पुस्तकों को सरकारी खरीद में डलवाने और पुस्तकालयों को थोक बेचने के प्रबन्ध कर रखे हैं। वे कहते हैं कि हम इन्हीं के भरोसे जिंदा हैं, क्योंकि बाजार में खुदरा बिक्री के तहत तो इक्का-दुक्का पुस्तकें ही बिक पाती हैं और वह भी रोज नहीं। कोई उनसे पूछे कि आपकी दुकानें तो फिर भी चल रही हैं, लेकिन लेखक तो हर तरह से घाटे में हैं। उनमें लाख लिखने की प्रतिभा तथा छपने की प्यास हो, जब तक वे इतने प्रसिध्द न हो जाएं कि अपने नाम के सहारे बिक सवेंफ या पाठयक्रम वगैरा में लग-लगा सवेंफ, तब तक वे चाहे जितने हाथ-पांव मारें और पैसे खर्च करें, उन्हें प्रकाशकों द्वारा खोदे कुएं में उतरना ही पड़ता है।</p>
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		<title>कविता - कौन सी महफिल में जाओगे</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2008 11:26:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[कविता]]></category>

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		<description><![CDATA[-वेद प्रकाश &#8216;वटुक&#8217; यू.एस.ए
कौन सी महफिलों में जाओगे
दर्द अपना किसे सुनाओगे
मौन मानव के साथ धोखा है
सच कहोगे, तो मारे जाओगे
जहर सुकरात को पिलायेंगे
सूली ईसा को वे चढ़ायेंगे
कातिलों का भी फलसफा तो है
कत्ल करके मसीह बनायेंगे
बस मुखौटे ही चन्द बदले हैं
केंचुली के ही रंग बदले हैं
सांप, फन, जहर कुछ नहीं बदले
काटने के ही ढंग बदले हैं
वही [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>-वेद प्रकाश &#8216;वटुक&#8217; यू.एस.ए</p>
<p>कौन सी महफिलों में जाओगे<br />
दर्द अपना किसे सुनाओगे<br />
मौन मानव के साथ धोखा है<br />
सच कहोगे, तो मारे जाओगे</p>
<p>जहर सुकरात को पिलायेंगे<br />
सूली ईसा को वे चढ़ायेंगे<br />
कातिलों का भी फलसफा तो है<br />
कत्ल करके मसीह बनायेंगे</p>
<p>बस मुखौटे ही चन्द बदले हैं<br />
केंचुली के ही रंग बदले हैं<br />
सांप, फन, जहर कुछ नहीं बदले<br />
काटने के ही ढंग बदले हैं</p>
<p>वही सब ग़ज़नवी अन्दाज होगा<br />
वतन के लूटने का काज होगा<br />
शहीदों ने कभी सोचा नहीं था<br />
उन्हीं के कातिलों का राज होगा</p>
<p>खुदी के सांप खुद को छल रहे हैं<br />
घर अपने ही दियों से जल रहे हैं<br />
बचाये आज किस को कौन किससे<br />
यहां तो सांप घर-घर पल रहे हैं</p>
<p>हमारी ही वफा के पेचोखम हैं<br />
हमारे ही किये खुद पर सितम हैं<br />
हमीं ने दूध था इनको पिलाया<br />
कि जिन सांपों के काटे आज हम हैं।</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>लेख - विश्व हिन्दी सचिवालय का सफरनामा</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2008 11:21:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[लेख]]></category>

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		<description><![CDATA[-इन्द्रदेव भोला इन्द्रनाथ, मारीशसविश्व हिन्दी सचिवालय का शिलान्यास हुए अब सात वर्ष बीत चुके हैं। पर अब भी हम इसी प्रतीक्षा में हैं कि विश्व सचिवालय के भवन का निर्माण कब होगा।
सन् 1975 हिन्दी जगत का ऐतिहासिक वर्ष था। इसी वर्ष में भारत के शहर नागपुर में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>-इन्द्रदेव भोला इन्द्रनाथ, मारीशसविश्व हिन्दी सचिवालय का शिलान्यास हुए अब सात वर्ष बीत चुके हैं। पर अब भी हम इसी प्रतीक्षा में हैं कि विश्व सचिवालय के भवन का निर्माण कब होगा।</p>
<p>सन् 1975 हिन्दी जगत का ऐतिहासिक वर्ष था। इसी वर्ष में भारत के शहर नागपुर में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया था। मार्के की बात यह थी कि प्रवासी भारतीय, मारीशस के प्रधानमंत्री डा. शिवसागर राम गुलाम को उस सम्मेलन का अध्यक्ष पद संभालने के लिए निमंत्रित किया गया था। इससे साबित होता है कि उनके प्रति भारतीयों की कितनी भावभीनी आत्मीयता थी। डा. शिवसागर रामगुलाम के बचपन के समय देश में हिन्दी पढ़ाने का प्रावधान नहीं था। डाक्टरी विधा के अध्ययन में वे 14 वर्ष तक विलायत में रहे। फिर भी वे धाराप्रवाह हिन्दी बोलते थे। प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी में ही अध्यक्षीय भाषण देकर उन्होंनें लाखों हिन्दी प्रेमियों का दिल जीत लिया था। अपने भाषण में उन्होंने एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय हिन्दी केंद्र की स्थापना का विचार रखा जहां से भारत के बाहर के देशों में भी हिन्दी का प्रचार हो। डा. रामगुलाम ने यह भी स्वीकृति दी कि अगले वर्ष यानी कि 1976 में मारीशस में हिन्दी का दूसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित किया जाए।</p>
<p>सन् 1976 में हिन्दी के इतिहास का द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन मारीशस में आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में एक अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी केन्द्र की मारीशस में स्थापना को प्रस्ताव रूप में स्वीकार किया गया। 1976 के पश्चात् आगे चलकर 1983 में नई दिल्ली में, 1993 में पुन: मारीशस में तथा 1996 में त्रिनिडाड में इस प्रस्ताव को समर्थन प्राप्त होता रहा।</p>
<p>15 दिसंबर 1985 को डा. शिवसागर रामगुलाम का देहावसान हो गया। उनके सुपुत्र डा. नवीनचन्द्र राम गुलाम देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंनें अपने पिता सर शिवसागर के महान सपने को साकार करने की ओर कदम उठाया। कहावत है &#8216;जस बाप तस पूत&#8217;। उन्होंनें भारत सरकार की सलाह से स्थानीय शिक्षा मंत्रलय के तत्वावधान में मारिसस में एक &#8216;विश्व हिन्दी सचिवालय&#8217; का दफ्तर खुलवाया। सचिवालय की स्थापना के लिए सलाहकार के रूप में श्रीमती सरिता बुध्द को नियुत्तफ किया गया। बाद में श्री अजामिल माताबदल जी सचिवालय के संयोजक नियुत्तफ हुए। फिर सचिवालय के लिए एक अलग दफ्तर और अतिरिक्त कर्मचारी नियुक्त किए गए। सचिवालय के दफ्तर में एक पुस्तकालय की व्यवस्था की गई और एक विश्व हिन्दी पत्रिका के प्रकाशन पर कार्य आरम्भ हुआ। संयोजक के प्रयास से एक कवि सम्मेलन का भी आयोजन हुआ जिसमें भाग लेने के लिए दिल्ली से डा. केदार नाथ सिंह तथा डा. राजेन्द्र गौतम को आमंत्रित किया गया। इस प्रकार काम आगे बढ़ता रहा और अंतत: विश्व हिन्दी सचिवालय की नींव डालने का समय आ गया।</p>
<p>मारीशस में महात्मा गांधी का पदार्पण 30 अक्टूबर 1901 को हुआ था। गांधी आगमन के शताब्दी समारोह (1नवंबर 2001) में भाग लेने तथा इसी अवसर पर मारीशस में विश्व हिन्दी सचिवालय (ॅवतसक भ्पदकप ैमबतमजंतपंज) की नींव डालने के लिए भारत के मानव संसाधन विकास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा महासागर विकास मंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी पधारे हुए थे। शिलान्यास समारोह के अवसर पर उन्होंनें एक सारगर्भित भाषण दिया जो पुरवाई के पाठकों के लिए हम नीचे दे रहे हैं :</p>
<p>देवियो और सज्जनो! आज मेरी आंखों के सामने एक सपना मारीशस की सुंदर धरती पर साकार हो रहा है, जो 26 वर्ष पूर्व 1975 में आपकी-हमारी पितृ-भूमि में देखा गया था। अवसर था नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन का। इस दौरान हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलाने के उत्साहपूर्ण वातावरण में स्वतंत्र मारीशस के प्रथम प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम ने मारीशस में स्थायी विश्व हिन्दी सचिवालय बनाये जाने का प्रस्ताव रखा। वे चाहते थे कि हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने का काम नियमित तथा सुसम्बध्द तरीके से चलाया जाए।</p>
<p>हिन्दी की अस्मिता का प्रतीक- हिन्दी सचिवालय बनाने का सपना विश्व भर के हिन्दी प्रेमियों के मन में बना रहा। मारीशस, भारत, फिर मारीशस और उसके बाद त्रिनिडाड में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलनों में हर बार यह संकल्प दोहराया गया। भारत और मारीशस ने इस सपने को साकार करने के लिए आगे बढ़कर पहल की और लंदन में छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन से पूर्व 20 अगस्त, 1999 के शुभ दिन, विश्व हिन्दी सचिवालय को परस्पर सहयोग से मारीशस में स्थापित करने के समझौते पर स्वीकृति की मुहर लगा दी गई। लंदन सम्मेलन ने इस सद्प्रयास का हार्दिक स्वागत किया और आज हम इस सुंदर भूमि पर उस सपने को साकार होते देख रहे हैं। मेरा सौभाग्य है कि मैं हिन्दी के विश्व मंदिर की आधार-शिला रख रहा हूं।</p>
<p>मित्रो, हिन्दी विश्व की प्राचीनतम तथा महानतम सांस्कृतिक, बौध्दिक और आध्यात्मिक परम्पराओं की वाहक संस्कृत भाषा की उत्तराधिकारी है। वेदों, उपनिषदों और रामायण-महाभारत जैसे गौरव-ग्रन्थों का अथाह ज्ञान देव-वाणी संस्कृत के माध्यम से हिन्दी को मिला। संस्कृत पुत्री हिन्दी और उसकी प्यारी-प्यारी बहनों (भारतीय भाषाओं) ने भत्तिफ और प्रेम की अलख जगा दी। यह पूरी धरोहर आपके देश में विद्यमान है। हिन्दी इसी प्रेम की भाषा है और यह मारीशस की पहचान की भाषा भी है।</p>
<p>मित्रो, यह सचिवालय अब हमारी अस्मिता का प्रतीक बन गया है। यह भारत और मारीशस की दोस्ती, साझी पहचान और साझी परम्परा का प्रतीक है।&#8221; जोशी जी के इस सुंदर भाषण की याद दिलाने के बाद अब हम आज की बात करते हैं। विश्व हिन्दी सचिवालय का शिलान्यास हुए अब सात वर्ष बीत चुके हैं। पर अब भी हम इसी प्रतीक्षा में हैं कि विश्व सचिवालय के भवन का निर्माण्ा कब होगा। 1996 से 2004 के बीच सचिवालय की स्थापना को लेकर कई ज्ञापनों पर हस्ताक्षर हुए। अंतिम ज्ञापन दोनों देशों की सहमति से 2005 में स्वीकृत एवं पारित हुआ। भारत तथा मारीशस के शिक्षा, विदेश तथा संस्कृति मंत्री के अधीन कई समितियां गठित हुई हैं। मारीशस के शिक्षा मंत्री माननीय धरमवीर गोकुल उसके पैट्रन हैं।</p>
<p>श्रीमती वीणु अरुण जो मारीशस में रामायण के प्रचारक श्री राजेन्द्र अरुण की धर्मपत्नी हैं, उन्हें विश्व हिन्दी सचिवालय का महामंत्री बनाया गया है। श्रीमती अरुण एक विदुषी महिला हैं। हिन्दी और संस्कृत में उन्होंने एम.ए. किया है। वर्षों से वे हिन्दी और संस्कृत पढ़ाती रही हैं। वे भारतीय तो हैं पर 30-35 सालों से मारीशस में रहने के बाद अब अपने को पूरी तरह मारीशस का मानती हैं। अभी एक भाड़े के भवन में स्थित हिन्दी सचिवालय के दफ्तर से वह अपना कार्य संचालित कर रही हैं। अपनी नियुत्तिफ के बाद देश के प्रमुख हिन्दी संस्थानों, जैसे आर्य सभा, हिन्दी प्रचारिणी सभा, ह्यूमन सर्विस ट्रस्ट आदि के अधिकारियों को अलग-अलग समय पर अपने दफ्तर में बुलाकर वह लगातार हिन्दी की स्थिति, प्रकाशन की समस्याओं, सम्भावनाओं आदि पर विचार विनिमय कर रही हैं। विश्व हिन्दी सचिवालय के उद्देश्यों से वह अतिथियों को अवगत कराती हैं और उन्हें भावी योजनाएं बताती हैं। फिर भी वे कहती हैं कि सभी कार्यों को कार्यान्वित करना आसान नहीं है। ऐसा करने के लिए अभी विभिन्न देशों से हिन्दी की प्रगति के सम्बन्ध में विचार-विमर्श करना है और योजनाएं बनानी हैं।</p>
<p>मारीशस स्थित विश्व हिन्दी सचिवालय का पहला भव्य विचार गोष्ठी समारोह गुरुवार 10 मई, 2007 को इन्दिरा गांधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र में देश के शिक्षा एवं मानव संसाधान मंत्री माननीय धरमवीर गोकुल की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस अवसर पर कला एवं संस्कृति मंत्री महेन्द्र गौरेसु, देश की हिन्दी संस्थाओं के प्रतिनिधि तथा बहुत से अन्य हिन्दी प्रेमी उपस्थित थे। विचार-गोष्ठी का विषय था, &#8216;हिन्दी का उन्नयन: चुनौतियां एवं समस्याएं।&#8217;</p>
<p>कार्यक्रम एक वन्दना गीत से शुरू हुआ। प्रसिध्द गायिका वर्षा रानी बिसेसर ने अपने मधुर स्वर में गीत प्रस्तुत किया :</p>
<p>&#8216;जन-जन की अभिलाषा।<br />
कि हिन्दी बने विश्व भाषा॥&#8217;</p>
<p>श्रीमती वीणु अरुण ने अपने स्वागत भाषण में विश्व हिन्दी सचिवालय के उद्देश्यों को संक्षेप में बताया। शिक्षा मंत्री, जो सचिवालय के पैट्रन हैं, उन्होंने हिन्दी की समुन्नति के लिए संगठित होकर कार्य करने को कहा। संगोष्ठी में भारतीय उच्चायोग के द्वितीय सचिव श्री जयप्रकाश कर्दम, कला और संस्कृति मंत्री माननीय महेन्द्र गौरेसु, आर्य सभा के महासचिव श्री सत्यदेव प्रीतम, हिन्दी संगठन के प्रधान श्री अजामिल माताबदल, साहित्यकार रामदेव धुरन्धर, महात्मा गांधी संस्थान के हिन्दी विभाग की डा. आर. गोबिन ने भाग लिया और हिन्दी को विश्व भाषा बनाने पर बल दिया। वक्ताओं का विचार था कि पहले हिन्दी को राष्ट्रसंघ में प्रायोगिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए पूरी कोशिश करनी चाहिए। इस दौरान हिन्दी के सम्मुख उपस्थित चुनौतियों और समस्याओं पर भी चर्चा की गई। विचार गोष्ठी अपने उद्देश्य में पूर्णत: सफल रही।</p>
<p>इस साल 2007 में आठवां विश्व हिन्दी सम्मेलन अमेरिका में होने जा रहा है। हिन्दी को राष्ट्रसंघ में प्रयोग की भाषा बनाने का प्रस्ताव बार-बार आता है पर अब तक यह केवल प्रस्ताव मात्र बनकर रह गया है। आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में जरूरत इस बात की है कि इस पर गम्भीरता से ध्यान दिया जाए।</p>
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		<title>लेख - एक निरंतरता का सवाल है बाबा</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2008 11:12:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[लेख]]></category>

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		<description><![CDATA[-प्रेम जनमेजय, भारतयदि हम ध्यान से अवलोकन करें तो क्या जिन देशों में हमने अत्यधिक सक्रिय सम्मेलन किए हैं, वहां क्या कोई सक्रियता बना पाए हैं? मेरे पास तो त्रिनिडाड का अनुभव है। उस देश में एक विश्व हिंदी सम्मेलन और दो अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं और हिंदी की स्थिति यह है कि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>-प्रेम जनमेजय, भारतयदि हम ध्यान से अवलोकन करें तो क्या जिन देशों में हमने अत्यधिक सक्रिय सम्मेलन किए हैं, वहां क्या कोई सक्रियता बना पाए हैं? मेरे पास तो त्रिनिडाड का अनुभव है। उस देश में एक विश्व हिंदी सम्मेलन और दो अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं और हिंदी की स्थिति यह है कि वह कदमताल जैसी करती दिखाई दे रही है।</p>
<p>ऐसा अक्सर होता है कि हम महानता की ओर अग्रसर होते हैं और लघुता बहुत पीछे छूट जाती है। जबकि हमारे पूर्वज और विशेषकर साहित्यिक पूर्वज हमें निरंतर चेताते रहे हैं कि जो काम सूई कर सकती है वो तलवार नहीं कर सकती और जहां तलवार का काम है वहां सूई बेकार है। दोनों का अपना-अपना महत्व है। अत: बहुत आवश्यक है कि कोई बड़ा काम करते समय हम छोटे संदर्भों की उपेक्षा न करें। दोनों का समान महत्व नहीं हो सकता है पर अपना-अपना महत्व तो है ही। एक का अधिक और दूसरे का कम हो सकता है, पर इतना कम नहीं कि वह उपेक्षणीय हो जाए।</p>
<p>अब हम विश्व हिंदी सम्मेलन की तैयारियों में हैं और जाहिर है कि विश्व हिंदी सम्मेलन है तो विश्वस्तरीय मुद्दों पर चर्चा करेंगे। उनकी तैयारियां करेंगे। हमारी सोच व्यापक होगी और हम व्यापकता की तलाश में विश्वस्तरीय सोच के साथ आगे बढ़ेंगे। इसमें कोई दोष भी नहीं है। परंतु एकांगी सोच अनेक बार हमें संकुचित कर देती है और हम एक बड़े मुद्दे से जुड़े छोटे-छोटे मुद्दों को नहीं देख पाते हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन का एक बड़ा लक्ष्य है हिंदी के प्रचार-प्रसार की दिशा में काम करते हुए हिंदी के वैश्विक स्वरूप को निरंतर विकसित करना। यही कारण है कि विश्व हिंदी सम्मेलन अक्सर विश्व के अलग-अलग देशों में किए जाते हैं। (भारत में तो हिंदी को उचित स्थान मिला ही हुआ है।) त्रिनिडाड, लंदन, सूरीनाम आदि देशों के बाद हम अमेरिका में हिंदी का झंडा फहराने जा रहे हैं। झंडा तो वैसे इससे पहले हमारे प्रवासी भारतीय फहरा चुके हैं, हम तो भारत और अन्य देशों के हिंदी प्रेमियों को यह सुअवसर प्रदान कर रहे हैं कि वे भी अमेरिका में हिंदी के फहराते झंडे को देखें और इस प्रकार जिन्होंने अमेरिका नहीं देखा है, वे उसे देख लें और जिन्होंने देखा है, वे पुन: देख लें। इससे हिंदी के वैश्विक स्वरूप में और निखार आ जाएगा।</p>
<p>इस सम्मेलन में अन्य सम्मेलनों की तरह अनेक अहम् मुद्दों पर आलेख पढ़े जाएंगे और चर्चा-परिचर्चा होगी। यह हिंदी के स्वास्थ्य के लिए अच्छा अनुलोम-विलोम प्राणायाम है। किसी भी बड़े आयोजन के लिए बड़े-बड़े शामियाने लगाए जाते हैं। (आजकल वातानुकूलित भवन लिए जाते हैं।) हजारों की संख्या में जुटी भीड़ एक सुखद दृश्य उपस्थित करती है। पर इस विशाल उत्सव के बाद रह जाती है एक निष्क्रिय उदासी। यदि हम ध्यान से अवलोकन करें तो क्या जिन देशों में हमने अत्यधिक सक्रिय सम्मेलन किए हैं, वहां क्या कोई सक्रियता बना पाए हैं? मेरे पास तो त्रिनिडाड का अनुभव है। उस देश में एक विश्व हिंदी सम्मेलन और दो अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं और हिंदी की स्थिति यह है कि वह कदमताल जैसी करती दिखाई दे रही है। इतने विशालकाय आयोजन यदि वहां की एक मात्र हिंदी संस्था &#8216;हिंदी निधि&#8217; के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष आदि को हिंदी लिखना तो दूर बोलना तक नहीं सिखा पाए तो&#8230;। मैं मानता हूं श्रीमान कि यह तुच्छ मुद्दा विश्व हिंदी सम्मेलन के लिए नहीं है, पर मुद्दा तो है।</p>
<p>मैं ऐसा सूरदास नहीं हूं कि हर उजाले को अंधेरे की दृष्टि से देखूं। मैं ये भी नहीं कह रहा हूं कि उस देश में हिंदी के लिए कुछ नहीं किया गया है। पर मेरा कहना ये है कि वहां जो हो रहा है और जो कुछ हो पा रहा है, वह वहां के हिंदी प्रेमियों के प्रेम का परिणाम है। वहां हिंदी के लिए अनन्य प्रेम है पर आवश्यकता है उस प्रेम की रक्षा करने की और हिंदी को सही दिशा देने की। सामाजिक एवं गैर सरकारी संस्थाओं की दृष्टि से वहां काम हो रहे हैं। सरकारी स्तर पर भी सुविधाएं उपलब्ध करवाई गई हैं, पर उनका क्रियान्वयन सही नहीं है। वहां एक समय में हिंदी सिखाने के लिए निहरेस्ट एवं वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय में दो व्यक्ति होते थे और इसके अतिरिक्त भारतीय उच्चायोग में हिंदी और संस्कृति का द्वितीय सचिव भी यह काम करता था। केंद्रीय हिंदी संस्थान में अध्ययन के लिए भारत सरकार छात्रवृत्ति भी देती थी/देती है। पर ये सब एक बंधे-बंधाए ढर्रे पर चल रहा है। कभी इस काम को एक मिशन की तरह नहीं लिया गया। त्रिनिडाड में हिंदी का प्राध्यापक पूजनीय होता है एवं एक विशिष्ट व्यक्ति के रूप में उसका सम्मान होता है। वहां अंग्रेजी झाड़ने वाले भारतीय का वो सम्मान नहीं है जितना हिंदी जानने वाले मास्टर का है। पर उनके द्वारा हिंदी भाषा को दिए जा रहे सम्मान का हम क्या बदला दे रहे हैं? वे तो हिंदी के प्रति अंधविश्वासी हैं, पर हमारे नेत्र तो खुले हैं।</p>
<p>त्रिनिडाड जैसे लगभग 14 देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी की अध्ययन पीठ है जिसका व्यय भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् उठाती है। उद्देश्य मात्र उस पीठ पर किसी की नियुक्ति नहीं होना चाहिए अपितु उस पीठ के माध्यम से कैसे हिंदी के प्रचार-प्रसार में निरंतरता लाई जा सकती है, उद्देश्य ये होना चाहिए। मुझसे पहले प्रो. जगन्नाथन, सुवास कुमार वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय में अतिथि आचार्य के पद पर गए थे। जब मैंने उनके द्वारा किए गए कार्याें का विवरण जानना चाहा और उनसे संपर्क के लिए सहायता चाही तो परिणाम मनचाहा नहीं था। मुझे व्यक्तिगत स्तर पर ही संपर्क साधने का जुगाड़ करना पड़ा। मेरे बाद आए डा. राजकुमार से संपर्क इसलिए रहा क्योंकि हम दोनों एक ही सोच के थे और ईमेल के माध्यम से संपर्क में रहते थे। डा. डफ्फू भी निरंतरता के पक्षधर थे। उन्होनें नई योजनाओं के साथ उन सारे कामों को आगे बढ़ाया जिनको मैंने आरंभ करने का प्रयास किया था। &#8216;बातचीत सभा&#8217; हिंदी निधि की पत्रिका, कवि सम्मेलनों की परंपरा तथा विश्वविद्यालय में माईनर हिंदी का पाठयक्रम जैसे अनेक कार्यक्रमों को उन्होनेंे डाव सिल्विया मोदी कूबालाल सिंह के सहयोग से निरंतरता दी।</p>
<p>वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय में प्राथमिक स्तर पर हिंदी पढ़ाते हुए मुझे अच्छा नहीं लगता था। मेरा स्वप्न था कि यहां भी मारिशस की तरह हिंदी का उच्च शिक्षा से संबंधित पाठयक्रम हो। जिस देश में लगभग पचास प्रतिशत जनता भारतीय मूल की हो और हिंदी से प्रेम करती हो, वहां अंग्रेजी के बाद स्पैनिश को दूसरी भाषा का दर्जा मिले तो ये हिंदी की कमजोरी को ही प्रकट करता है। डा. सिल्विया और डा. राजकुमार डफ्फू के प्रयत्नों से विश्वविद्यालय को इस पाठयक्रम के लिए राजी कर लिया गया। किंतु, जब उसे प्रस्तुत होना था तभी डा. राजकुमार की अवधि समाप्त हो गई और अकेली पड़ी सिल्विया पदमुक्त हो गईं। अब स्थिति पुन: शून्य की है। मेरा मानना है कि यदि इन देशों में हिंदी का समुचित विकास करना है तो विकास के कार्यक्रमों में एकरूपता एवं निरंतरता लानी होगी। हर देश और स्थान की स्थानीय राजनीति होती है, ऐसे में भारत से जाने वाले अध्यापकों की निष्पक्ष भूमिका बहुत कारगर सिध्द होती है।</p>
<p>इसके साथ ही ऐसे देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में भारतीय उच्चायोग की भूमिका बहुत अहम् होती है। उनके सहयोग के बिना आप लगभग शून्य होते हैं। मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे प्रो. परिमल कुमार दास एवं श्री वीरेंद्र गुप्ता का पूर्ण सहयोग मिला। वरना तो सुना जाता है कि विदेश मंत्रलय में कुछ का मानना तो ये है कि ये हिंदी-शिंडी क्या होती है। ऐसी हिंदी-शिंडी की सोच वालों के आगे रोए तो अपने नैन खोए वाला मामला होता है। आज भी यू.के. के हिंदी प्रेमी श्री लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के योगदान को निरंतर याद करते हैं तो उसका कोई तो अर्थ है।</p>
<p>जैसे पाठयक्रम में एकरूपता आवश्यक है, वैसे ही कार्यक्रमों में एक निरंतरता भी बहुत आवश्यक है और यह किसी समिति के गठन से होगी या किसी अन्य प्रयास से, ये सुधीजनों को सोचना है। देखने में ये मुद्दा लघु हो सकता है। पर, ये पूरे देश में हिंदी के स्वरूप को प्रभावित कर रहा है।</p>
<p>संपर्क : 73, साक्षर अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-110063</p>
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		<title>कविता - जीवन सत्य</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2008 11:09:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[कविता]]></category>

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		<description><![CDATA[-जय वर्मा
परीक्षा के गलियारे से
जब गुजरता है इंसान
संकीर्ण दायरों का
तब होता है एहसास
अनुभवों की लकीरों पर चलकर
स्वयं ही सीखता है वह
अनुभूतियों की गहराई
और कर्म का महत्वपूर्ण सिध्दान्त
राग द्वेष कम करने के लिए
स्वयं प्रयत्न करता है वह
व्यावहारिक स्वभाव से
अंत:करण की शुध्दि
करना चाहता है वह
जानता है कि कर्म फल से
किसी को भी छुटकारा नहीं मिलता
विरासत में मिली [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>-जय वर्मा<br />
परीक्षा के गलियारे से<br />
जब गुजरता है इंसान<br />
संकीर्ण दायरों का<br />
तब होता है एहसास<br />
अनुभवों की लकीरों पर चलकर<br />
स्वयं ही सीखता है वह<br />
अनुभूतियों की गहराई<br />
और कर्म का महत्वपूर्ण सिध्दान्त<br />
राग द्वेष कम करने के लिए<br />
स्वयं प्रयत्न करता है वह<br />
व्यावहारिक स्वभाव से<br />
अंत:करण की शुध्दि<br />
करना चाहता है वह<br />
जानता है कि कर्म फल से<br />
किसी को भी छुटकारा नहीं मिलता<br />
विरासत में मिली संस्कृति<br />
के अस्तित्व में रहकर<br />
स्वयं को खोजता है वह<br />
बेख़बर वह देखता रह जाता है<br />
चारों तरफ<br />
जब ज़िंदगी मुट्ठी भरी रेत की तरह<br />
हाथों से बिखर जाती है<br />
एक गुज़रे हुए पल की तरह<br />
एक गुज़रे हुए कल की तरह।</p>
]]></content:encoded>
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