कविता - जीवन सत्य
कविता - - Posted on November, 22 at 6:09 am
-जय वर्मा
परीक्षा के गलियारे से
जब गुजरता है इंसान
संकीर्ण दायरों का
तब होता है एहसास
अनुभवों की लकीरों पर चलकर
स्वयं ही सीखता है वह
अनुभूतियों की गहराई
और कर्म का महत्वपूर्ण सिध्दान्त
राग द्वेष कम करने के लिए
स्वयं प्रयत्न करता है वह
व्यावहारिक स्वभाव से
अंत:करण की शुध्दि
करना चाहता है वह
जानता है कि कर्म फल से
किसी को भी छुटकारा नहीं मिलता
विरासत में मिली संस्कृति
के अस्तित्व में रहकर
स्वयं को खोजता है वह
बेख़बर वह देखता रह जाता है
चारों तरफ
जब ज़िंदगी मुट्ठी भरी रेत की तरह
हाथों से बिखर जाती है
एक गुज़रे हुए पल की तरह
एक गुज़रे हुए कल की तरह।
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