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लेख - एक निरंतरता का सवाल है बाबा

लेख - - Posted on November, 22 at 6:12 am

-प्रेम जनमेजय, भारतयदि हम ध्यान से अवलोकन करें तो क्या जिन देशों में हमने अत्यधिक सक्रिय सम्मेलन किए हैं, वहां क्या कोई सक्रियता बना पाए हैं? मेरे पास तो त्रिनिडाड का अनुभव है। उस देश में एक विश्व हिंदी सम्मेलन और दो अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं और हिंदी की स्थिति यह है कि वह कदमताल जैसी करती दिखाई दे रही है।

ऐसा अक्सर होता है कि हम महानता की ओर अग्रसर होते हैं और लघुता बहुत पीछे छूट जाती है। जबकि हमारे पूर्वज और विशेषकर साहित्यिक पूर्वज हमें निरंतर चेताते रहे हैं कि जो काम सूई कर सकती है वो तलवार नहीं कर सकती और जहां तलवार का काम है वहां सूई बेकार है। दोनों का अपना-अपना महत्व है। अत: बहुत आवश्यक है कि कोई बड़ा काम करते समय हम छोटे संदर्भों की उपेक्षा न करें। दोनों का समान महत्व नहीं हो सकता है पर अपना-अपना महत्व तो है ही। एक का अधिक और दूसरे का कम हो सकता है, पर इतना कम नहीं कि वह उपेक्षणीय हो जाए।

अब हम विश्व हिंदी सम्मेलन की तैयारियों में हैं और जाहिर है कि विश्व हिंदी सम्मेलन है तो विश्वस्तरीय मुद्दों पर चर्चा करेंगे। उनकी तैयारियां करेंगे। हमारी सोच व्यापक होगी और हम व्यापकता की तलाश में विश्वस्तरीय सोच के साथ आगे बढ़ेंगे। इसमें कोई दोष भी नहीं है। परंतु एकांगी सोच अनेक बार हमें संकुचित कर देती है और हम एक बड़े मुद्दे से जुड़े छोटे-छोटे मुद्दों को नहीं देख पाते हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन का एक बड़ा लक्ष्य है हिंदी के प्रचार-प्रसार की दिशा में काम करते हुए हिंदी के वैश्विक स्वरूप को निरंतर विकसित करना। यही कारण है कि विश्व हिंदी सम्मेलन अक्सर विश्व के अलग-अलग देशों में किए जाते हैं। (भारत में तो हिंदी को उचित स्थान मिला ही हुआ है।) त्रिनिडाड, लंदन, सूरीनाम आदि देशों के बाद हम अमेरिका में हिंदी का झंडा फहराने जा रहे हैं। झंडा तो वैसे इससे पहले हमारे प्रवासी भारतीय फहरा चुके हैं, हम तो भारत और अन्य देशों के हिंदी प्रेमियों को यह सुअवसर प्रदान कर रहे हैं कि वे भी अमेरिका में हिंदी के फहराते झंडे को देखें और इस प्रकार जिन्होंने अमेरिका नहीं देखा है, वे उसे देख लें और जिन्होंने देखा है, वे पुन: देख लें। इससे हिंदी के वैश्विक स्वरूप में और निखार आ जाएगा।

इस सम्मेलन में अन्य सम्मेलनों की तरह अनेक अहम् मुद्दों पर आलेख पढ़े जाएंगे और चर्चा-परिचर्चा होगी। यह हिंदी के स्वास्थ्य के लिए अच्छा अनुलोम-विलोम प्राणायाम है। किसी भी बड़े आयोजन के लिए बड़े-बड़े शामियाने लगाए जाते हैं। (आजकल वातानुकूलित भवन लिए जाते हैं।) हजारों की संख्या में जुटी भीड़ एक सुखद दृश्य उपस्थित करती है। पर इस विशाल उत्सव के बाद रह जाती है एक निष्क्रिय उदासी। यदि हम ध्यान से अवलोकन करें तो क्या जिन देशों में हमने अत्यधिक सक्रिय सम्मेलन किए हैं, वहां क्या कोई सक्रियता बना पाए हैं? मेरे पास तो त्रिनिडाड का अनुभव है। उस देश में एक विश्व हिंदी सम्मेलन और दो अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं और हिंदी की स्थिति यह है कि वह कदमताल जैसी करती दिखाई दे रही है। इतने विशालकाय आयोजन यदि वहां की एक मात्र हिंदी संस्था ‘हिंदी निधि’ के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष आदि को हिंदी लिखना तो दूर बोलना तक नहीं सिखा पाए तो…। मैं मानता हूं श्रीमान कि यह तुच्छ मुद्दा विश्व हिंदी सम्मेलन के लिए नहीं है, पर मुद्दा तो है।

मैं ऐसा सूरदास नहीं हूं कि हर उजाले को अंधेरे की दृष्टि से देखूं। मैं ये भी नहीं कह रहा हूं कि उस देश में हिंदी के लिए कुछ नहीं किया गया है। पर मेरा कहना ये है कि वहां जो हो रहा है और जो कुछ हो पा रहा है, वह वहां के हिंदी प्रेमियों के प्रेम का परिणाम है। वहां हिंदी के लिए अनन्य प्रेम है पर आवश्यकता है उस प्रेम की रक्षा करने की और हिंदी को सही दिशा देने की। सामाजिक एवं गैर सरकारी संस्थाओं की दृष्टि से वहां काम हो रहे हैं। सरकारी स्तर पर भी सुविधाएं उपलब्ध करवाई गई हैं, पर उनका क्रियान्वयन सही नहीं है। वहां एक समय में हिंदी सिखाने के लिए निहरेस्ट एवं वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय में दो व्यक्ति होते थे और इसके अतिरिक्त भारतीय उच्चायोग में हिंदी और संस्कृति का द्वितीय सचिव भी यह काम करता था। केंद्रीय हिंदी संस्थान में अध्ययन के लिए भारत सरकार छात्रवृत्ति भी देती थी/देती है। पर ये सब एक बंधे-बंधाए ढर्रे पर चल रहा है। कभी इस काम को एक मिशन की तरह नहीं लिया गया। त्रिनिडाड में हिंदी का प्राध्यापक पूजनीय होता है एवं एक विशिष्ट व्यक्ति के रूप में उसका सम्मान होता है। वहां अंग्रेजी झाड़ने वाले भारतीय का वो सम्मान नहीं है जितना हिंदी जानने वाले मास्टर का है। पर उनके द्वारा हिंदी भाषा को दिए जा रहे सम्मान का हम क्या बदला दे रहे हैं? वे तो हिंदी के प्रति अंधविश्वासी हैं, पर हमारे नेत्र तो खुले हैं।

त्रिनिडाड जैसे लगभग 14 देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी की अध्ययन पीठ है जिसका व्यय भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् उठाती है। उद्देश्य मात्र उस पीठ पर किसी की नियुक्ति नहीं होना चाहिए अपितु उस पीठ के माध्यम से कैसे हिंदी के प्रचार-प्रसार में निरंतरता लाई जा सकती है, उद्देश्य ये होना चाहिए। मुझसे पहले प्रो. जगन्नाथन, सुवास कुमार वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय में अतिथि आचार्य के पद पर गए थे। जब मैंने उनके द्वारा किए गए कार्याें का विवरण जानना चाहा और उनसे संपर्क के लिए सहायता चाही तो परिणाम मनचाहा नहीं था। मुझे व्यक्तिगत स्तर पर ही संपर्क साधने का जुगाड़ करना पड़ा। मेरे बाद आए डा. राजकुमार से संपर्क इसलिए रहा क्योंकि हम दोनों एक ही सोच के थे और ईमेल के माध्यम से संपर्क में रहते थे। डा. डफ्फू भी निरंतरता के पक्षधर थे। उन्होनें नई योजनाओं के साथ उन सारे कामों को आगे बढ़ाया जिनको मैंने आरंभ करने का प्रयास किया था। ‘बातचीत सभा’ हिंदी निधि की पत्रिका, कवि सम्मेलनों की परंपरा तथा विश्वविद्यालय में माईनर हिंदी का पाठयक्रम जैसे अनेक कार्यक्रमों को उन्होनेंे डाव सिल्विया मोदी कूबालाल सिंह के सहयोग से निरंतरता दी।

वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय में प्राथमिक स्तर पर हिंदी पढ़ाते हुए मुझे अच्छा नहीं लगता था। मेरा स्वप्न था कि यहां भी मारिशस की तरह हिंदी का उच्च शिक्षा से संबंधित पाठयक्रम हो। जिस देश में लगभग पचास प्रतिशत जनता भारतीय मूल की हो और हिंदी से प्रेम करती हो, वहां अंग्रेजी के बाद स्पैनिश को दूसरी भाषा का दर्जा मिले तो ये हिंदी की कमजोरी को ही प्रकट करता है। डा. सिल्विया और डा. राजकुमार डफ्फू के प्रयत्नों से विश्वविद्यालय को इस पाठयक्रम के लिए राजी कर लिया गया। किंतु, जब उसे प्रस्तुत होना था तभी डा. राजकुमार की अवधि समाप्त हो गई और अकेली पड़ी सिल्विया पदमुक्त हो गईं। अब स्थिति पुन: शून्य की है। मेरा मानना है कि यदि इन देशों में हिंदी का समुचित विकास करना है तो विकास के कार्यक्रमों में एकरूपता एवं निरंतरता लानी होगी। हर देश और स्थान की स्थानीय राजनीति होती है, ऐसे में भारत से जाने वाले अध्यापकों की निष्पक्ष भूमिका बहुत कारगर सिध्द होती है।

इसके साथ ही ऐसे देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में भारतीय उच्चायोग की भूमिका बहुत अहम् होती है। उनके सहयोग के बिना आप लगभग शून्य होते हैं। मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे प्रो. परिमल कुमार दास एवं श्री वीरेंद्र गुप्ता का पूर्ण सहयोग मिला। वरना तो सुना जाता है कि विदेश मंत्रलय में कुछ का मानना तो ये है कि ये हिंदी-शिंडी क्या होती है। ऐसी हिंदी-शिंडी की सोच वालों के आगे रोए तो अपने नैन खोए वाला मामला होता है। आज भी यू.के. के हिंदी प्रेमी श्री लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के योगदान को निरंतर याद करते हैं तो उसका कोई तो अर्थ है।

जैसे पाठयक्रम में एकरूपता आवश्यक है, वैसे ही कार्यक्रमों में एक निरंतरता भी बहुत आवश्यक है और यह किसी समिति के गठन से होगी या किसी अन्य प्रयास से, ये सुधीजनों को सोचना है। देखने में ये मुद्दा लघु हो सकता है। पर, ये पूरे देश में हिंदी के स्वरूप को प्रभावित कर रहा है।

संपर्क : 73, साक्षर अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-110063

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