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लेख - विश्व हिन्दी सचिवालय का सफरनामा

लेख - - Posted on November, 22 at 6:21 am

-इन्द्रदेव भोला इन्द्रनाथ, मारीशसविश्व हिन्दी सचिवालय का शिलान्यास हुए अब सात वर्ष बीत चुके हैं। पर अब भी हम इसी प्रतीक्षा में हैं कि विश्व सचिवालय के भवन का निर्माण कब होगा।

सन् 1975 हिन्दी जगत का ऐतिहासिक वर्ष था। इसी वर्ष में भारत के शहर नागपुर में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया था। मार्के की बात यह थी कि प्रवासी भारतीय, मारीशस के प्रधानमंत्री डा. शिवसागर राम गुलाम को उस सम्मेलन का अध्यक्ष पद संभालने के लिए निमंत्रित किया गया था। इससे साबित होता है कि उनके प्रति भारतीयों की कितनी भावभीनी आत्मीयता थी। डा. शिवसागर रामगुलाम के बचपन के समय देश में हिन्दी पढ़ाने का प्रावधान नहीं था। डाक्टरी विधा के अध्ययन में वे 14 वर्ष तक विलायत में रहे। फिर भी वे धाराप्रवाह हिन्दी बोलते थे। प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी में ही अध्यक्षीय भाषण देकर उन्होंनें लाखों हिन्दी प्रेमियों का दिल जीत लिया था। अपने भाषण में उन्होंने एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय हिन्दी केंद्र की स्थापना का विचार रखा जहां से भारत के बाहर के देशों में भी हिन्दी का प्रचार हो। डा. रामगुलाम ने यह भी स्वीकृति दी कि अगले वर्ष यानी कि 1976 में मारीशस में हिन्दी का दूसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित किया जाए।

सन् 1976 में हिन्दी के इतिहास का द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन मारीशस में आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में एक अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी केन्द्र की मारीशस में स्थापना को प्रस्ताव रूप में स्वीकार किया गया। 1976 के पश्चात् आगे चलकर 1983 में नई दिल्ली में, 1993 में पुन: मारीशस में तथा 1996 में त्रिनिडाड में इस प्रस्ताव को समर्थन प्राप्त होता रहा।

15 दिसंबर 1985 को डा. शिवसागर रामगुलाम का देहावसान हो गया। उनके सुपुत्र डा. नवीनचन्द्र राम गुलाम देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंनें अपने पिता सर शिवसागर के महान सपने को साकार करने की ओर कदम उठाया। कहावत है ‘जस बाप तस पूत’। उन्होंनें भारत सरकार की सलाह से स्थानीय शिक्षा मंत्रलय के तत्वावधान में मारिसस में एक ‘विश्व हिन्दी सचिवालय’ का दफ्तर खुलवाया। सचिवालय की स्थापना के लिए सलाहकार के रूप में श्रीमती सरिता बुध्द को नियुत्तफ किया गया। बाद में श्री अजामिल माताबदल जी सचिवालय के संयोजक नियुत्तफ हुए। फिर सचिवालय के लिए एक अलग दफ्तर और अतिरिक्त कर्मचारी नियुक्त किए गए। सचिवालय के दफ्तर में एक पुस्तकालय की व्यवस्था की गई और एक विश्व हिन्दी पत्रिका के प्रकाशन पर कार्य आरम्भ हुआ। संयोजक के प्रयास से एक कवि सम्मेलन का भी आयोजन हुआ जिसमें भाग लेने के लिए दिल्ली से डा. केदार नाथ सिंह तथा डा. राजेन्द्र गौतम को आमंत्रित किया गया। इस प्रकार काम आगे बढ़ता रहा और अंतत: विश्व हिन्दी सचिवालय की नींव डालने का समय आ गया।

मारीशस में महात्मा गांधी का पदार्पण 30 अक्टूबर 1901 को हुआ था। गांधी आगमन के शताब्दी समारोह (1नवंबर 2001) में भाग लेने तथा इसी अवसर पर मारीशस में विश्व हिन्दी सचिवालय (ॅवतसक भ्पदकप ैमबतमजंतपंज) की नींव डालने के लिए भारत के मानव संसाधन विकास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा महासागर विकास मंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी पधारे हुए थे। शिलान्यास समारोह के अवसर पर उन्होंनें एक सारगर्भित भाषण दिया जो पुरवाई के पाठकों के लिए हम नीचे दे रहे हैं :

देवियो और सज्जनो! आज मेरी आंखों के सामने एक सपना मारीशस की सुंदर धरती पर साकार हो रहा है, जो 26 वर्ष पूर्व 1975 में आपकी-हमारी पितृ-भूमि में देखा गया था। अवसर था नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन का। इस दौरान हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलाने के उत्साहपूर्ण वातावरण में स्वतंत्र मारीशस के प्रथम प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम ने मारीशस में स्थायी विश्व हिन्दी सचिवालय बनाये जाने का प्रस्ताव रखा। वे चाहते थे कि हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने का काम नियमित तथा सुसम्बध्द तरीके से चलाया जाए।

हिन्दी की अस्मिता का प्रतीक- हिन्दी सचिवालय बनाने का सपना विश्व भर के हिन्दी प्रेमियों के मन में बना रहा। मारीशस, भारत, फिर मारीशस और उसके बाद त्रिनिडाड में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलनों में हर बार यह संकल्प दोहराया गया। भारत और मारीशस ने इस सपने को साकार करने के लिए आगे बढ़कर पहल की और लंदन में छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन से पूर्व 20 अगस्त, 1999 के शुभ दिन, विश्व हिन्दी सचिवालय को परस्पर सहयोग से मारीशस में स्थापित करने के समझौते पर स्वीकृति की मुहर लगा दी गई। लंदन सम्मेलन ने इस सद्प्रयास का हार्दिक स्वागत किया और आज हम इस सुंदर भूमि पर उस सपने को साकार होते देख रहे हैं। मेरा सौभाग्य है कि मैं हिन्दी के विश्व मंदिर की आधार-शिला रख रहा हूं।

मित्रो, हिन्दी विश्व की प्राचीनतम तथा महानतम सांस्कृतिक, बौध्दिक और आध्यात्मिक परम्पराओं की वाहक संस्कृत भाषा की उत्तराधिकारी है। वेदों, उपनिषदों और रामायण-महाभारत जैसे गौरव-ग्रन्थों का अथाह ज्ञान देव-वाणी संस्कृत के माध्यम से हिन्दी को मिला। संस्कृत पुत्री हिन्दी और उसकी प्यारी-प्यारी बहनों (भारतीय भाषाओं) ने भत्तिफ और प्रेम की अलख जगा दी। यह पूरी धरोहर आपके देश में विद्यमान है। हिन्दी इसी प्रेम की भाषा है और यह मारीशस की पहचान की भाषा भी है।

मित्रो, यह सचिवालय अब हमारी अस्मिता का प्रतीक बन गया है। यह भारत और मारीशस की दोस्ती, साझी पहचान और साझी परम्परा का प्रतीक है।” जोशी जी के इस सुंदर भाषण की याद दिलाने के बाद अब हम आज की बात करते हैं। विश्व हिन्दी सचिवालय का शिलान्यास हुए अब सात वर्ष बीत चुके हैं। पर अब भी हम इसी प्रतीक्षा में हैं कि विश्व सचिवालय के भवन का निर्माण्ा कब होगा। 1996 से 2004 के बीच सचिवालय की स्थापना को लेकर कई ज्ञापनों पर हस्ताक्षर हुए। अंतिम ज्ञापन दोनों देशों की सहमति से 2005 में स्वीकृत एवं पारित हुआ। भारत तथा मारीशस के शिक्षा, विदेश तथा संस्कृति मंत्री के अधीन कई समितियां गठित हुई हैं। मारीशस के शिक्षा मंत्री माननीय धरमवीर गोकुल उसके पैट्रन हैं।

श्रीमती वीणु अरुण जो मारीशस में रामायण के प्रचारक श्री राजेन्द्र अरुण की धर्मपत्नी हैं, उन्हें विश्व हिन्दी सचिवालय का महामंत्री बनाया गया है। श्रीमती अरुण एक विदुषी महिला हैं। हिन्दी और संस्कृत में उन्होंने एम.ए. किया है। वर्षों से वे हिन्दी और संस्कृत पढ़ाती रही हैं। वे भारतीय तो हैं पर 30-35 सालों से मारीशस में रहने के बाद अब अपने को पूरी तरह मारीशस का मानती हैं। अभी एक भाड़े के भवन में स्थित हिन्दी सचिवालय के दफ्तर से वह अपना कार्य संचालित कर रही हैं। अपनी नियुत्तिफ के बाद देश के प्रमुख हिन्दी संस्थानों, जैसे आर्य सभा, हिन्दी प्रचारिणी सभा, ह्यूमन सर्विस ट्रस्ट आदि के अधिकारियों को अलग-अलग समय पर अपने दफ्तर में बुलाकर वह लगातार हिन्दी की स्थिति, प्रकाशन की समस्याओं, सम्भावनाओं आदि पर विचार विनिमय कर रही हैं। विश्व हिन्दी सचिवालय के उद्देश्यों से वह अतिथियों को अवगत कराती हैं और उन्हें भावी योजनाएं बताती हैं। फिर भी वे कहती हैं कि सभी कार्यों को कार्यान्वित करना आसान नहीं है। ऐसा करने के लिए अभी विभिन्न देशों से हिन्दी की प्रगति के सम्बन्ध में विचार-विमर्श करना है और योजनाएं बनानी हैं।

मारीशस स्थित विश्व हिन्दी सचिवालय का पहला भव्य विचार गोष्ठी समारोह गुरुवार 10 मई, 2007 को इन्दिरा गांधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र में देश के शिक्षा एवं मानव संसाधान मंत्री माननीय धरमवीर गोकुल की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस अवसर पर कला एवं संस्कृति मंत्री महेन्द्र गौरेसु, देश की हिन्दी संस्थाओं के प्रतिनिधि तथा बहुत से अन्य हिन्दी प्रेमी उपस्थित थे। विचार-गोष्ठी का विषय था, ‘हिन्दी का उन्नयन: चुनौतियां एवं समस्याएं।’

कार्यक्रम एक वन्दना गीत से शुरू हुआ। प्रसिध्द गायिका वर्षा रानी बिसेसर ने अपने मधुर स्वर में गीत प्रस्तुत किया :

‘जन-जन की अभिलाषा।
कि हिन्दी बने विश्व भाषा॥’

श्रीमती वीणु अरुण ने अपने स्वागत भाषण में विश्व हिन्दी सचिवालय के उद्देश्यों को संक्षेप में बताया। शिक्षा मंत्री, जो सचिवालय के पैट्रन हैं, उन्होंने हिन्दी की समुन्नति के लिए संगठित होकर कार्य करने को कहा। संगोष्ठी में भारतीय उच्चायोग के द्वितीय सचिव श्री जयप्रकाश कर्दम, कला और संस्कृति मंत्री माननीय महेन्द्र गौरेसु, आर्य सभा के महासचिव श्री सत्यदेव प्रीतम, हिन्दी संगठन के प्रधान श्री अजामिल माताबदल, साहित्यकार रामदेव धुरन्धर, महात्मा गांधी संस्थान के हिन्दी विभाग की डा. आर. गोबिन ने भाग लिया और हिन्दी को विश्व भाषा बनाने पर बल दिया। वक्ताओं का विचार था कि पहले हिन्दी को राष्ट्रसंघ में प्रायोगिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए पूरी कोशिश करनी चाहिए। इस दौरान हिन्दी के सम्मुख उपस्थित चुनौतियों और समस्याओं पर भी चर्चा की गई। विचार गोष्ठी अपने उद्देश्य में पूर्णत: सफल रही।

इस साल 2007 में आठवां विश्व हिन्दी सम्मेलन अमेरिका में होने जा रहा है। हिन्दी को राष्ट्रसंघ में प्रयोग की भाषा बनाने का प्रस्ताव बार-बार आता है पर अब तक यह केवल प्रस्ताव मात्र बनकर रह गया है। आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में जरूरत इस बात की है कि इस पर गम्भीरता से ध्यान दिया जाए।

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