कविता - कौन सी महफिल में जाओगे
कविता - - Posted on November, 22 at 6:26 am
-वेद प्रकाश ‘वटुक’ यू.एस.ए
कौन सी महफिलों में जाओगे
दर्द अपना किसे सुनाओगे
मौन मानव के साथ धोखा है
सच कहोगे, तो मारे जाओगे
जहर सुकरात को पिलायेंगे
सूली ईसा को वे चढ़ायेंगे
कातिलों का भी फलसफा तो है
कत्ल करके मसीह बनायेंगे
बस मुखौटे ही चन्द बदले हैं
केंचुली के ही रंग बदले हैं
सांप, फन, जहर कुछ नहीं बदले
काटने के ही ढंग बदले हैं
वही सब ग़ज़नवी अन्दाज होगा
वतन के लूटने का काज होगा
शहीदों ने कभी सोचा नहीं था
उन्हीं के कातिलों का राज होगा
खुदी के सांप खुद को छल रहे हैं
घर अपने ही दियों से जल रहे हैं
बचाये आज किस को कौन किससे
यहां तो सांप घर-घर पल रहे हैं
हमारी ही वफा के पेचोखम हैं
हमारे ही किये खुद पर सितम हैं
हमीं ने दूध था इनको पिलाया
कि जिन सांपों के काटे आज हम हैं।
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