लेख - शोषण के लिए प्रस्तुत लेखक
लेख - - Posted on November, 22 at 6:30 am
-डा. गौतम सचदेव, यू.के.
पैसे देकर छपने वाले लेखक एक ओर प्रकाशकों को अधिकाधिक शोषक बना रहे हैं, तो दूसरी ओर स्वयं अपना अवमूल्यन करवा रहे हैं। उधर प्रकाशक और लेखक के सामने पाठक बेबस हैं, जिन्हें अच्छे साहित्य के स्थान पर अधिकतर बेकार की चीजें पढ़ने को मिल रही हैं।
प्रकाशकों द्वारा लेखकों का शोषण किये जाने की महागाथा में अब एक अद्भुत मोड़ आया है। अब लेखक शोषित होने के लिए प्रकाशकों के पीछे दौड़ रहे हैं। एक जमाना था जब लेखक प्रकाशक से अपनी पुस्तक की रायल्टी मांगा करते थे, लेकिन अब अनेक लेखकों की छपने की प्यास इतनी बढ़ गई है कि इसे शान्त करने के लिए वे प्रकाशकों को मुंह मांगे पैसे देते हैं। इनमें भी जो लेखक सम्पन्न हैं और विशेष रूप से विदेशों में रहते हैं, सुना है वे प्रकाशकों को पैसे देने में और भी उदार हो रहे हैं। इससे प्रकाशकों को पुस्तक का प्रचार करने और उसे बेचने की कोई चिन्ता नहीं रही। यही नहीं, चूंकि उन्हें लेखकों को रायल्टी भी नहीं देनी पड़ती, इसलिए उनकी न हींग लग रही है, न फिटकरी और लाभ के रूप में रंग भी चोखा होता जा रहा है।
हाल ही में अपनी भारत यात्र के दौरान मुझे दिल्ली में एक जानकार सज्जन ने बताया कि ब्रिटेन के कुछ लेखक प्रकाशकों को बुरी तरह बिगाड़ रहे हैं। वे बोले, चूंकि एक ब्रितानी पाउंड की विनिमय-दर लगभग अस्सी-पचासी रुपये है, इसलिए ये लेखक थोड़े-से पाउंड खर्च करके धड़ा-धड़ छप रहे हैं। जब मैंने उन्हें याद दिलाया कि आज अन्य प्रवासी लेखकों की तुलना में ब्रिटेन के लेखकों की पुस्तवेंफ सबसे ज्यादा छप रही हैं, तो वे बोले- इससे क्या फर्क पड़ता है, उनमें उच्च स्तर की तो गिनी-चुनी ही हैं और फिर, उन पुस्तकों की क्या महत्ता, जिनमें अधिकतर पैसे देकर छपती हैं। उनका कहना था कि इन लेखकों ने हिन्दी साहित्य के प्रकाशन को एक गन्दा व्यवसाय बना दिया है। मैंने उनकी बात को अस्वीकार करते हुए कहा कि सारा दोष ब्रितानी लेखकों के मत्थे मढ़ना गलत है। साहित्य को इस स्थिति तक पहुंचाने में भारतीय और प्रवासी लेखक, प्रकाशक, समाज और व्यवस्था सभी दोषी हैं। लेकिन उन सज्जन की बात में भी वजन था। पैसे देकर छपने वाले लेखक एक ओर प्रकाशकों को अधिकाधिक शोषक बना रहे हैं, तो दूसरी ओर स्वयं अपना अवमूल्यन करवा रहे हैं।
उधर प्रकाशक और लेखक के सामने पाठक बेबस हैं, जिन्हें अच्छे साहित्य के स्थान पर अधिकतर बेकार की चीजें पढ़ने को मिल रही है। प्रकाशक प्राय: कहते हैं कि हिन्दी की पुस्तवेंफ बिकती नहीं हैं, क्योंकि खरीदकर पढ़ने वाले पाठकों की संख्या नगण्य है। लेकिन, जो लोग अच्छा साहित्य पढ़ना चाहते हैं और खरीदने को तैयार हैं, प्राय: उन्हें वह उपलब्ध नहीं होता। प्रकाशक वही पुस्तवेंफ छापते और बेचते हैं, जिनसे उन्हें लाभ हो और इधर जबसे लेखक उन्हें पैसे देने लगे हैं, तबसे वे अच्छा साहित्य छापने में और भी कम रुचि दिखाते हैं। फिर, चूंकि हिन्दी में उचित और निष्पक्ष समीक्षा करने वाले गिने-चुने समीक्षक हैं और अधिकतर लेखकों एवं प्रकाशकों को न तो ऐसी समीक्षा अच्छी लगती है और न ही उन्हें इसकी जरूरत है, इसलिए पाठकों का अच्छे साहित्य से वंचित होना स्वाभाविक है।
मेरे कहने का अभिप्राय यह नहीं है कि प्रकाशक बेकार हैं और वे बुरे ही होते हैं। नहीं, लेखकों को समाज के सामने लाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है। प्राय: प्रकाशक ही लेखकों की छपने की इच्छा को पूरा करते हैं और उनका प्रचार-प्रसार भी करते हैं। वे साहित्य और समाज के बीच की अनिवार्य और उपयोगी कड़ी हैं। माना कि वे साहित्य जैसी पवित्र वस्तु को भी एक जिन्स समझते हैं और उसे छापते-बेचते समय नैतिक आदर्शों का पालन नहीं करते, लेकिन मत भूलिए कि वे भी अन्य व्यापारियों की तरह व्यापारी ही हैं। वे सरस्वती के उपासक नहीं हैं। काश कि वे लेखकों और उनकी रचनाओं का सम्मान कर पाते, जिनके कारण वे अपना व्यवसाय चलाते हैं। अगर प्रकाशकों से पूछें, तो वे कहते हैं कि हमारी भी परेशानियां हैं, क्योंकि आधुनिक समाज की जरूरतों और प्राथमिकताओं में साहित्य का स्थान बहुत गौण हो गया है। इंटरनेट, टेलिविजन और फिल्मों आदि की लोकप्रियता के कारण बहुत-से लोगों ने तो पुस्तवेंफ पढ़ना ही छोड़ दिया है। इन परिस्थितियों में हमें आज वह भी करना पड़ता है, जो हम पहले नहीं करते थे।
साहित्य में समाज की दिलचस्पी कम हो जाने को देखते हुए सवाल उठता है कि भारतीय और प्रवासी हिन्दी लेखक किनके लिए लिख रहे हैं?
अगर वे पैसे देकर छप रहे हैं, तो सिवाय इसके कि उनकी छपास पूरी हो रही है और उनके अहं की तुष्टि हो रही है, उन्हें और क्या मिल रहा है? माना कि छपना लेखक की बहुत बड़ी उपलब्धि है, लेकिन छप जाने से ही कोई लेखक बड़ा नहीं बन जाता। बड़ा वह है, जिसका साहित्य स्थायी महत्व का है तथा आलोचक और पाठक जिसे बड़ा समझते हैं। सत्साहित्य दैनिक समाचारपत्र की तरह केवल घंटे-दो-घंटे की सनसनी पैदा करने के लिये नहीं होता, बल्कि दीर्घकाल तक विचारोत्तेजक और चित्ताकर्षक बना रहता है तथा उसे संजोकर रखने और दुबारा पढ़ने को जी चाहता है। सत्साहित्य समाज की बौध्दिक बपौती है, लेकिन ऐसा साहित्य न तो रोज लिखा जाता है और न ही हर रचना कालजयी होती है।
अगर पैसे देकर छपने की बात को थोड़ी देर के लिए छोड़ दें, तो भी आज जो कुछ छप रहा है, वह अधिकतर साधारण स्तर का है। लेखक न तो आत्मालोचन और अध्ययन करते हैं और न ही अभ्यास। आज लेखक तो सैकड़ों विद्यमान हैं, लेकिन साहित्यकार कहलाने वाले बहुत कम हैं। सस्ती वाहवाही लूटने वालों की कतार में लेखक भी शामिल हैं। कोई अपने मुंह मियां मिट्ठू बनकर शोर मचा रहा है और प्रसिध्दि लूट रहा है, तो कोई सलाम-साधक या सम्पर्क-साधक बनकर सम्मान और पुरस्कार हथिया रहा है, लेकिन बुध्दिजीवी होने के नाते ये लेखक क्या कभी सोचते हैं कि वे समाज को किधर ले जा रहे हैं? कुछ लेखक कह सकते हैं कि हमें समाज अब न तो बौध्दिक मार्गदर्शक समझता है और न ही चिन्तक या विचारक। यह बात आंशिक रूप से सत्य होने पर भी लेखकों से पूछा जा सकता है कि क्या वे प्रकाशकों को सिर पर चढ़ाकर और ज्यादा शोषक नहीं बना रहे? लेखक कहेंगे कि जब प्रकाशक हमें छापते ही नहीं, तो हम और क्या करें? सौभाग्य से कुछ ऐसे ईमानदार प्रकाशक अब भी मौजूद हैं, जो रचना के स्तर को पैसों से अधिक महत्व देते हैं, लेकिन सोचिए, कल को अगर सारे प्रकाशक लेखकों से पैसे मांगने लगेंगे, तो क्या होगा?
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज के लेखक भी प्रकाशकों से उतने ही परेशान हैं, जितने पुराने लेखक थे। इनमें वे लेखक सबसे अधिक परेशान और उपेक्षित हैं, जिनके पास न तो छपने के लिए पैसे हैं, न ही साधन या सम्पर्क साधने की कला। वे चाहे जितने अच्छे लेखक हों, उन्हें कोई नहीं छापता। उनकी सुध लेने या उन्हें आगे लाने की न तो किसी को जरूरत है और न ही दिलचस्पी। इनसे थोड़ी बेहतर स्थिति उन लेखकों की है, जो किसी-न-किसी तरह छप रहे हैं, लेकिन वे भी यदि बड़े-बड़े साहित्यकारों, आलोचकों, सम्पादकों, अकादमियों और उच्च पीठाधीशों से जोड़-तोड़ नहीं कर पा रहे, तो छपने के बाद भी हाशिये पर पड़े हुए हैं। उधर सलाम-साधक न केवल प्रसिध्दि और पुरस्कार पा रहे हैं, बल्कि अच्छे और प्रसिध्द साहित्यकार भी कहला रहे हैं। ऐसे लेखकों के दोनों हाथों में लड्डू हैं।
आधुनिक समाज की साहित्य के प्रति चाहे जो भी धारण हो, लेकिन इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि लेखक समाज के लिए आवश्यक है और समाज लेखक के लिए। रही बात प्रकाशकों द्वारा लेखकों के शोषण की, तो यह बात कोई नई नहीं है। प्रेमचंद और निराला तक उनके शिकार हुए। तब क्या प्रकाशकों को सीख देने के लिए लेखकों को लिखना और छपना बंद कर देना चाहिए या स्वयं प्रकाशक बन जाना चाहिए? यहां ब्रिटेन में मेरे एक परिचित लेखक ने प्रकाशकों से तंग आकर कुछ समय अपनी दो पुस्तवेंफ स्वयं छपवा लीं। मैंने उनसे पूछा, क्या उन पुस्तकों की बिक्री भी आप ही कर रहे हैं? तो उनका उत्तर था- नहीं, ब्रिटेन में खरीदकर पढ़ने वाले पाठक कहां हैं। इस लिए मैंने मुद्रित मूल्य से आधे पर अपनी दोनों पुस्तवेंफ भारत के एक पुस्तक विक्रेता के पास रखवाई हैं। समस्या के इस समाधान से वे सन्तुष्ट दिखाई दिये, लेकिन जब मैंने शंका की कि आप उस पुस्तक विक्रेता से अपने पैसों की वसूली कैसे करेंगें तथा पाउंड खर्च करके पुस्तवेंफ छपवाने के बाद क्या आप उनके बदले रुपये लेना पसंद करेंगे? तो वे बगलें झांकने लगे।
स्वयं प्रकाशक बन जाने वाला लेखक जरूरी नहीं कि कुशल व्यवसायी भी बन जाये। ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे, जब प्रकाशक बनने वाले लेखक बाद में दुखी हुए। मुझे स्मरण है, कई दशक पूर्व दिल्ली के कुछ लेखकों ने मिलकर एक सहकारी प्रकाशन संस्थान आरम्भ किया था, लेकिन कुछ समय बाद वह बंद हो गया। उसके बंद होने के कारण तो मुझे ज्ञात नहीं, लेकिन उन कारणों की कल्पना करना मुश्किल नहीं है। लेखकों के सहकारी प्रकाशक बनने पर उनकी सबसे बड़ी समस्या होती है कि किसे पहले छापा जाये। चूंकि सहकारी प्रकाशन संस्थान निवेशकों का साझा उद्यम होता है और वे सब एक साथ छापे नहीं जा सकते, इसलिए उनमें मनोमालिन्य उत्पन्न हो जाता है। फिर, जिस लेखक को पहले छापा जाता है, यदि उसकी पुस्तक की बिक्री से लागत वसूल नहीं होती, तो शेष लेखक अगले प्रकाशन के लिए नया निवेश करना बंद कर देते हैं।
सहकारी प्रकाशन संस्थान बनाने के अतिरिक्त इस दिशा में कुछ और उपाय भी किये गए हैं, जैसे कुछ वर्ष पहले यू.के. हिन्दी समिति ने मेरा सुझाव मानकर हर वर्ष एक स्थानीय लेखक की पुस्तक छपवाना शुरू किया। दो-तीन पुस्तवेंफ छपवाई गईं, लेकिन अब लगता है कि व्यावहारिक और व्यावसायिक समस्याओं के भंवर में यह नैय्या भी डगमगा रही है। संस्थाएं और संगठन भी तो आखिर मनुष्य ही चलाते हैं। किसी में राजनीति का प्रवेश हो जाता है, तो किसी में सन्देहों और निहित स्वार्थों का। यदि और कुछ नहीं, तो जिस प्रकाशक से पुस्तक छववाई जाती है, उसका हिस्सा और बिक्री आदि की समस्याएं विवाद उत्पन्न करने लगती हैं। मतलब यह कि कोई-न-कोई परिस्थिति ऐसी अवश्य बन जाती है, जब आदर्श प्रतीत होने वाली योजना भी कांटों में उलझ जाती है।
हाल ही में भारत सरकार के तत्वावधान में लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने भी लेखकों की सहायता करने की सराहनीय योजना लागू की है। इसके अन्तर्गत प्रति वर्ष प्रवासी लेखक को उसकी पुस्तक के प्रकाशन के लिए बीस हजार रुपये की सहायता राशि दी जायेगी। आशा की जा सकती है कि इससे लेखकों की स्थिति में कुछ सुधार अवश्य होगा, लेकिन इससे भी प्रति वर्ष केवल एक लेखक का भाग्य ही तो चमकेगा। शेष का क्या होगा?
अन्त में एक अन्य कटु सत्य पर विचार करना भी अप्रासंगिक न होगा। प्रकाशक किसी पुस्तक की वास्तव में जितनी प्रतियां छापते हैं, यह लेखक को वे शायद ही बताते हों। अब चूंकि हिन्दी पुस्तकों के संस्करण पांच सौ के भी नहीं रहे और सुनते हैं किसी-किसी पुस्तक के तो ढाई-तीन सौ के होते हैं। ऐसे में लेखक प्रकाशक द्वारा बताई संख्या पर विश्वास न करे, तो क्या करे? चतुर प्रकाशकों ने अपनी दुकानें चलाने के लिए पुस्तकों को सरकारी खरीद में डलवाने और पुस्तकालयों को थोक बेचने के प्रबन्ध कर रखे हैं। वे कहते हैं कि हम इन्हीं के भरोसे जिंदा हैं, क्योंकि बाजार में खुदरा बिक्री के तहत तो इक्का-दुक्का पुस्तकें ही बिक पाती हैं और वह भी रोज नहीं। कोई उनसे पूछे कि आपकी दुकानें तो फिर भी चल रही हैं, लेकिन लेखक तो हर तरह से घाटे में हैं। उनमें लाख लिखने की प्रतिभा तथा छपने की प्यास हो, जब तक वे इतने प्रसिध्द न हो जाएं कि अपने नाम के सहारे बिक सवेंफ या पाठयक्रम वगैरा में लग-लगा सवेंफ, तब तक वे चाहे जितने हाथ-पांव मारें और पैसे खर्च करें, उन्हें प्रकाशकों द्वारा खोदे कुएं में उतरना ही पड़ता है।
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