लेख - डायसपोरा में हिन्दी साहित्य-रचना
लेख - - Posted on November, 22 at 6:34 am
-सुषम बेदी, यू.एस.ए.
बात यह है कि विदेशी भारतीयों को रचनात्मक कर्म के लिये नयी भावभूमि तो सहज ही हासिल हो गयी है पर उसकी अभिव्यक्ति का कलात्मक पक्ष अभी भी कमजोर है। जब तक इस दिशा में न केवल नयी भावभूमियों की तलाश, बल्कि उस तलाश के साथ अभिव्यंजना के नये दरवाजे न खोले जायें, नये सिक्के न गढ़े जायें, नये मुहावरे न खोजे जायें, तब तक गर्वोक्तियां खोखली ही बजेंगी।
लोग यहां धड़ाके से लिख तो रहे हैं। दायें-बायें किताबें भी खूब निकल रही हैं। पैसे की गर्मी है न… और पैसा है तो जितना चाहो भारत से किताबें छपवा लो। तो फिर विश्व के सबसे धनी देश के वासियों के पास किताबें छपवाने की दिक्कत क्यों हो?
पर क्या जो छप जाता है वह साहित्य बन जाता है? अखबार भी तो रोज सैंकड़ों छपे कागज निकाल डालते हैं। उन्हीं को पुस्तक रूप में बांध दें तो बहुत से लोग उनके साहित्य होने का भ्रम जरूर पाल लेंगे। इसीलिये साहित्य की रक्षा की जरूरत आ पड़ी है कि छपने-छपाने की भीड़ में वह कहीं खो न जाये। चूंकि पैसा कुछ ज्यादा जोर से बोलता है, इसीलिये अनजाने ही जब हम सर उठाकर देखते हैं तो पाते हैं कि साहित्य की बागडोर उन लोगों के हाथ में आ पड़ी है जो संस्थाएं बना सकते हैं, उनके खर्चीले कार्यक्रम और मेले कर सकते हैं और फिर हिंदी के नाम पर लगभग कूपमंडूक अंग्रेजी के स्थानीय अखबारों में अपनी खबरें छपवा सकते हैं। इन अखबार वालों को हिंदी साहित्य क्या है, इसका अंदाज तक नहीं, सो आप जिस किसी का नाम ले दें, वह साहित्यकार मान लिया जाएगा। इन्होंने ज्यादा से ज्यादा अगर किसी हिंदी साहित्यकार का नाम सुना होगा तो प्रेमचंद का। अखबारों की अपनी जरूरतें रहती हैं। उनको आप विज्ञापन देते-दिलवाते रहिए, वे आपके बारे में छापते रहेंगे।
यह बात नहीं कि हिंदी वालों में प्रतिभा नहीं। बात यह है कि जिनमें प्रतिभा होती है वे चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। न उनके पास मेले करने का वक्त होता है और न उनमें भाग लेने का। अगर भाग ले भी लें तो धक्कम-धक्की में उनका कुछ जाता ही है, हासिल नहीं होता। इसलिये मेलेबाजी से खुद को दूर रखके काम करते रहना एक तरह से उनका चुनाव और मजबूरी दोनों ही होती है।
बाकी कुछ प्रतिभावाले लोग अगर मेलेबाजी में पड़ जाते हैं तो फिर उनका सारा वक्त इसी में गुम हो जाता है। कुछ झूठ-मूठ का नाम जरूर कमा लेते हैं पर ठोस लेखन के नाम पर खास कुछ होता नहीं उनके पास।
बात यह है कि लेखन के लिये तो साधना की, तपस्या की जरूरत होती है। भागते-दौड़ते, चलते-फिरते गंभीर लेखन नहीं होता। उसके लिये टिकाव और अध्ययन-मनन चाहिये। आपने अगर पढ़ना छोड़ दिया तो फिर लेखन में भी गंभीरता और गहनता कैसे आयेगी? अगर काम धंधों की भीड़ में सोचने का वक्त नहीं तो सोच से खाली साहित्य किस काम का?
अगर अपने भीतर झांक कर अपनी भावराशि को मथने, परखने, महसूस करने की फुर्सत नहीं तो क्या खाक लिखेंगे आप!
यूं मेलेबाजी की भी अपनी एक जगह है, इसे मैं नकारती नहीं। लेखक समाज का सदस्य है और साहित्य एक सामाजिक कर्म है। चाहे उसे एकांत में बैठकर लिखा जाये या भरे-पूरे घर-परिवार के बीच, है तो वह पाठकों के लिये ही। इसलिये अगर लोग मिल-बैठ कर साहित्य चर्चा करें तो साहित्य का आस्वादन भी होता है और अच्छे-बुरे साहित्य की पहचान का भी मौका लगता है। इन दृष्टियों से मेलों की अपनी अहमियत है। पर मेले अगर इसी उद्देश्य से किये जायें कि अपनी ओर ध्यान आकर्षित करना है, न कि श्रेष्ठ साहित्य की चर्चा और परख-पहचान। तो ऐसी स्थिति में वह कुछ लोगों की अपनी गर्वोक्तियों और ढिंढोरेबाजी से ज्यादा कुछ और नहीं हो पाता।
इधर हाल ही में छपे हुए कुछ लेख पढ़ते हुए ऐसी ही गर्वोक्तियां और नारेबाजी मेरी नजर में आयीं… इंगलैण्ड के लेखक भारत के हिन्दी लेखकों से कमतर नहीं। यहां भी वैसा ही उच्चकोटि का साहित्य लिखा जा रहा है जैसा कि भारत में…। मैं चौंकी। किन भारतीय लेखकों से मुकाबला किया जा रहा है इन ब्रितानी हिंदी लेखकों का? भारत में भी तो हर तरह के लेखक हैं? घटिया से घटिया और श्रेष्ठ से श्रेष्ठ! क्या है कोई इंग्लैंड में जिसे आप मुक्तिबोध के साथ बिठा सवेंफ, या रेणु और श्रीलाल शुक्ल के कथा साहित्य की श्रेणी दे सवेंफ? अगर मेडियोकर लेखकों से ही मुकाबला करना है तो कुछ भी कह कर खुश हो लीजिये! इसी तरह से खुद को तसल्ली देते रहिये या इस आत्मप्रवंचना के जरिये अपनी लेखकीय हस्ती को संपुष्ट करते रहिये।
मैं यह कहती हूं कि ऐसी आत्मप्रवंचना या गर्वोक्तियों की जरूरत क्या है? अब या तो ब्रितानी भारतीय उस ग्रंथि के शिकार हैं जिसके तहत गोरे ब्रितानियों ने खुद को हमेशा दूसरी जातियों से बेहतर घोषित किया और जबरदस्ती या चालाकी से सबसे यह मनवाने की कोशिश की। साथ ही दूसरों की श्रेष्ठता को नजरंदाज किया। आत्मविश्वास अच्छी बात है। लेकिन मात्र आत्मविश्वास अच्छा साहित्य तो नहीं दे सकता।
मैं यह भी नहीं कहती कि ब्रिटेन और अमरीका में लिखा जाने वाला सारा हिंदी साहित्य हीनता ग्रंथि से ग्रस्त रहे और अपनी स्वीकृति के लिये भारत का ही मुंह जोहता रहे। पर अपनी गर्वोक्तियां सुनाने से पहले अपने गिरेबां में भी तो झांक लेना जरूरी है।
बात यह है कि विदेशी भारतीयों को रचनात्मक कर्म के लिये नयी भावभूमि तो सहज ही हासिल हो गयी है पर उसकी अभिव्यक्ति का कलात्मक पक्ष अभी भी कमजोर है। जब तक इस दिशा में न केवल नयी भावभूमियों की तलाश, बल्कि उस तलाश के साथ अभिव्यंजना के नये दरवाजे न खोले जायें, नये सिक्के न गढ़े जायें, नये मुहावरे न खोजे जायें, तब तक यह गर्वोक्तियां खोखली ही बजेंगी। मैं यह पूछना चाहूंगी कि क्या कोई प्रेमचंद हुआ है जिसने कथा साहित्य को कोई नया मोड़ दिया हो, कोई वात्स्यायन हुआ है जिसने पहले वाली धाराओं पर बांध लगा कर अपने लिये नये रास्ते बनाने की साहित्य की मौलिक परिभाषा को रेखांकित किया हो। निर्मल वर्मा, राकेश, रेणु या सोबती जिन्होंने अपनी रचनाओं के साथ-साथ अपनी भाषा की भी खोज की, उसे संवारा-निखारा, नये रंग, भाव, बिम्ब दिये। क्या ऐसे कोई यहां हुआ?
मुझे लगता है कि अभी हम नयी भाषा की रचना नहीं कर पाये। जो हिन्दी का नमूना भारत के हिंदी साहित्यकार हमें पकड़ा गये हैं उसी से गुजारा चला रहे हैं।
इस भाषा में एक बासीपन है, जिसे प्रेंफच भाषा में ‘देजा वु’ कहते हैं। यानि कि पहले से देखा, जाना हुआ। ऐसा महसूस होता है। भाषा की ताजगी किसी भी नये रचनाकर्म की अंदरूनी जरूरत है। यूं कहीं-कहीं नये भाव-बिम्ब दिख भी जाते हैं जो विदेश के संदर्भों से ही उठे हैं, लेकिन बहुत कम। अंग्रेजी में लिखने वाले ऐशियाई लेखकों ने भाषा का भारतीयकरण करके अपनी अंग्रेजी को नयापन दिया है जो भारत में भी हो रहा है, मात्र डायसपोरा में ही नहीं। किंतु, डायसपोरा के सलमान रशदी इस क्षेत्र में अग्रणी हैं। इसलिये यह श्रेय मैं उन्हीं को दूंगी। बाद में तो अरुंधती राय और कई दूसरे लेखकों ने भी भाषा में ताजगी भरने का यह तरीका अपनाया है।
क्या हिंदी के लेखकों के लिये यह रास्ता हिंदी के अंग्रेजीकरण की दिशा में होगा? यह सवाल आपत्तिजनक और विवादास्पद हो सकता है। बहुत से सुधीजन मेरे इस सुझाव पर पत्थर बरसायेंगे। मैं यह नहीं कह रही कि आप अंग्रेजीकरण के माध्यम से ही साहित्य की भाषा का परिष्कार करें। पर अगर कोई शब्द एक बिम्ब लेकर आ ही जाता है तो उसका परिहार करने की भी जरूरत नहीं है।
भारत में तो हिंगलिश जैसी भाषाएं भी चल पड़ी हैं। पर वे मीडिया की भाषा हैं, साहित्य की नहीं। इसी तरह अमरीका में भारतीय मूल की युवा पीढ़ी द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी की भी अलग रंगत बन रही है। उसमें अमरीकी अंग्रेजी का पुट तो है ही ; साथ ही अमरीकी मुहावरे भी अनूदित होकर चले आते हैं। लेकिन कालेजों, यूनिवर्सीटीयों में हिन्दी सीखे हुए युवा भाषा का शुध्द रूप ही बरतते हैं।
इससे हिंदी को लाभ-हानि दोनों ही है। एक तरफ हिंदी उन सब तक पहुंच रही है जो अन्यथा अंग्रेजी के कार्यक्रम ही सुनते-देखते। वहीं हिंदी के इस अपभ्रंश रूप को शिष्ट वर्ग की स्वीकृति मिल रही है। देखा जाये तो हिंदी का जन्म संस्कृत के एक अपभ्रंश के रूप से ही हुआ था। सो यह विकास का एक सहज क्रम मान कर स्वीकार किया जा सकता है। अंतत: इसका क्या रूप होगा यह भविष्य ही बतलायेगा। क्या हिंगलिश और तथाकथित शुध्द हिंदी या साहित्यिक हिंदी दो अलग भाषाएं हो जायेंगी या कहीं मिल मिलाकर एक रूप बनाये रखेंगी, कहा नहीं जा सकता। हां भाषा विज्ञान के इतिहास के आधार पर यह अटकल जरूर लगायी जा सकती है कि शायद वे दो अलग भाषाएं हो जायेंगी, जैसे कि फिजी की पिजिन हिंदी। हिंदी से समानता रखते हुए भी यह भाषा पूरी तरह से हिंदी नहीं कहला सकती। इसी तरह हिंग्लिश भी हिंदी नहीं कहला पायेगी, उसकी एक शाखा भर ही हो पायेगी।
हिंदी के विकास को रोकना हमारे बस की बात नहीं। न ही इसे रोकना चाहिये। संस्कृत को बचाने की बहुत कोशिश पाणिनी ने की लेकिन उसके रूपांतरण को रोक नहीं पाये। संस्कृत आज भी हमारे बीच है। इसी तरह हिंदी का शुध्द रूप भी संभव है बरसों बना रहे। हिंदी को अगर बांध दें तो उसका विकास रुक जायेगा। यहीं हिंदी को लेकर उर्दू का सवाल भी उठ जाता है। कितने फारसी शब्द स्वीकार्य हैं, कितने नहीं। कौन सा स्वीकार्य है कौन सा नहीं। इस तरह के बहुत से मसले उठते हैं जिन पर मैं किसी और लेख में बात करूंगी।
मूल बात ईमानदारी की है। भाषा का इस्तेमाल करने की ईमानदारी। यानी कि घिसे-घिसाए प्रयोगों को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने की बजाय ऐसे शब्दों का चुनाव हो जो सचमुच उस भाव या विचार को वहन कर सवेंफ जो कि लिखने वाले के मन में आया है। इसी तरह बात विधाओं की भी है- प्रसाद कामायनी लिख गये और मैं भी एक काव्य ग्रंथ लिखकर प्रसाद जैसी ख्याति पाना चाहता हूं- ऐसे विचार के बहुत लोग यहां हैं और हर जगह हैं। लेकिन लोग भूल जाते हैं कि प्रसाद को कामायनी लिख कर जो मिला वह इसलिये क्योंकि वह उनकी खोज थी। किसी और की खोज को वे अपने अहम् की तुष्टि के लिये नहीं गढ़ रहे थे।
अब जरा पुरस्कारों की बात भी कर ली जाये। इधर प्रवासी भारतीयों को साहित्यिक योगदान पर पुरस्कार प्रदान भी किये जाने लगे हैं। यह काम बहुत प्रशंसनीय है। रचनाकारों को प्रोत्साहन भी मिलेगा इससे। लेकिन किसी साहित्य क्षेत्र में कितने पुरस्कार दिये जाते हैं, इस बात से साहित्य की श्रेष्ठता साबित नहीं होती। बहुत बार इससे श्रेष्ठ कृतियों की पहचान की घोषणा होती है जो कि स्पृहणीय कर्म है। यह भी प्रमाणित होता है कि साहित्य कर्म की उस समाज विशेष में प्रतिष्ठा है, आदर है। लेकिन बहुत बार पुरस्कार श्रेष्ठ कृतियों की अवहेलना भी कर जाते हैं और एक बार पुरस्कार की परंपरा स्थापित हो जाये तो किसी वर्ष श्रेष्ठ कृति के उस वर्ष न होने पर भी पुरस्कार देने के लिये किसी का चुनाव मजबूरी हो जाती है। फिर चुनाव मंडल के हर तरह के पक्षपात या व्यक्तिगत रुचियां इस चयन पर असर करती हैं। पुरस्कार कृति को ही मिले या समग्र कर्म को, ऐसे भी बहुत से सवाल विवादास्पद हैं।
कहना मैं यह चाहती हूं कि किसी भी भाषा के साहित्य कर्म की श्रेष्ठता को पुरस्कारों की गिनती से निर्धारित नहीं किया जा सकता। बहुत सी संस्थायें आजकल इस कर्म में प्रवृत्त हैं। कुछ हद तक पुरस्कार प्रदान कर वे साहित्य के क्षेत्र में अपनी जगह बनाना चाहती हैं। पर इससे वे साहित्य कर्म की श्रेष्ठता को साबित नहीं कर सकतीं।
बात यह है कि एक ओर तो प्रवासी भारतीय श्रेष्ठतर लेखक, या कहिये कि किसी से कमतर लेखक न होने का दंभ भरते हैं, दूसरी ओर यह भी दरखास्त की जाती है कि चूंकि प्रवासी भारत के बारह बैठ कर लिख रहा है, तो उसके लिये साहित्य के मानदंड कुछ कमजोर कर दिये जायें। यह उसी तरह की बात है जैसे कि किसी को मंडल कमीशन की सिफारिश दिलाने की जरूरत हो। अगर ऐसा किया भी जाये तो क्या इससे यह साबित नहीं होता कि प्रवासी साहित्य चाहे दोयम श्रेणी का ही क्यों न हो, उसे साहित्य की दुनिया में सुरक्षित स्थान की जरूरत है।
शायद इसी डर की वजह से मैं कहना चाहती हूं कि हमारे साहित्य को ही, हमारी अभिव्यक्तियों को ही यह साबित करना है कि हम कहां हैं, कितने पानी में हैं। न तो हमारी गर्वोक्तियां यह साबित कर सकती हैं, न ही याचनायें।
फिर हम कैसे कह सकते हैं कि भारतीय हिंदी लेखकों से हम कम नहीं। अभी हमारी यात्र बहुत लंबी है। पड़ाव दूर है। अगर हम आगे बढ़ते चले जाना चाहते हैं, बेहतर होते चले जाना चाहते हैं। हमें भी मुक्तिबोध पैदा करने हैं, निराला और प्रेमचंद के लिये जमीन तैयार करनी है, तो आत्मप्रशंसा, आत्मप्रवंचना, हमारा रास्ता बीच में ही रोक देगी। हमें लगातार आत्मान्वेषण की जरूरत है, आत्मविश्लेषण की जरूरत है, अपने आप को झुठलाने, बहलाने की नहीं! अपनी आलोचना, अपनी नुक्ताचीनी, अपना आलोड़न, अपना परीक्षण और अपना परिष्कार करते हुए ही हम साहित्य संसार को श्रेष्ठ रचनायें दे सकते हैं।
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