कविता - विश्व हिन्दी सम्मेलन पर
कविता - - Posted on November, 22 at 6:35 am
(ओसाका, जापान से डा. यासमीन सुलताना नकवी की कविताएं)
आओ, फिर से आओ
आओ-आओ अमीर खुसरो
स्वतन्त्र भारत को
फिर से नूतन वाणी दो
आवश्यकता है
तुम्हारे चिंतन की
मनमंथन की
हृदय के धड़कन की
तुम्हारे हृदय में फिर
धधक उठे तीव्र ज्वाला
रच दो कोई भजन
राम, रहीम रस वाला
फ्गोरे-गोरे मुखड़े पे
श्याम चदरिया ओढे
सोए सुरवालाय्
झूम के हर कोई गाए
पीकर प्रेम-भक्ति का प्याला,
हो मतवाला
कहां हो आओ
रास्ता उलझा है बाबा कबीर
नागफनियां उगी हैं डगर-डगर
नहीं कोई कहीं अबीर
अब आ जाओ
अपनी वाणी लेकर
तुम तो हो वाणी के नायक
आओ अपनी
प्रखर वाणी लेकर
जगाओ एक अलख
जगे जगत जीवन भर
चल पड़ें सभी छोटे-बड़े
हिन्दी की डगर पर ।
क्यों है उलझन
चलो आओ एक बार ठान लो
जागने और जगाने को
बहुत दिनों से सोए हैं हम
नहीं वक्त और घड़ी गंवाने को
बार-बार मारी गई,
कत्ल हुआ हिन्दी का
लिखित नहीं मौखिक नहीं
सच्चा रंग लौटा दो हिन्दी का
सत्य है सभ्यता है
अपनी वाणी में
जैसे मां और बाप
क्यों है उलझन हमको हिन्दी से,
यह बहुत बड़ा है अभिशाप
एक स्वर से स्वराज की
गूंज उठी थी हिन्दी में
आजाद हुआ देश,
उड़ा दी धज्जी
हिन्दी की हिन्दी में
बहुत देर नहीं
जब बतायेगा कोई दूसरा
हम क्या हैं,
क्या है संस्कृति
और संस्कार हमारा
एक प्रश्न खड़ा है
रावण सा प्रत्यक्ष
इसका उत्तर कैसे मिले,
बताए कौन है अध्यक्ष
जम्मू कश्मीर और कन्याकुमारी
का किसान
करता है कैसे आपस में
संवादों का आदान-प्रदान।
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