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पुरवाइयां

पुरवाइयाँ - - Posted on November, 22 at 6:46 am

-डा. पद्मेश गुप्त

पुरवाई के जीवनकाल का यह तीसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन है। लंदन में हुए छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन एवं सुरिनाम में आयोजित सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के सुअवसर पर पुरवाई विशेषांक ले कर आई थी। विश्व भर के अनेक हिन्दी प्रेमियों तक पत्रिका पहुुंची। इस बार विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर मैंने सोचा कि क्यों न मैं पुरवाई को विश्व हिन्दी सम्मेलन पर पूर्णत: आधारित न करते हुए उसे कुछ वास्तविक रंग में प्रस्तुत करूं। विश्व हिन्दी सम्मेलन पर पूर्णत: समर्पित तो अनेक पत्रिकाएं अमरीका जाने की तैयारी में लगी हुई हैं। परन्तु, हमारी पुरवाई इस विश्व हिन्दी सम्मेलन में समर्पण के लिए तैयार हुई है अपने सहज और सरल शृंगार के साथ। पुरवाई का वास्तविक परिचय यही है, नए लेखकों को प्रेरित करना, स्थापित रचनाकारों का आशीर्वचन लेना, हर रंग के साहित्य को स्थान देना, सिर्फ भारत या इंग्लैण्ड ही नहॅ अपितु विश्व के जिस कोने से हिन्दी की आवाज़ आए, उसे आत्मसात करना और जहां हिन्दी खामोश हो वहां हिन्दी को आवाज़ देना।

किसी एक विधा या एक दृष्टिकोण की पत्रिका नहॅ है पुरवाई। किसी एक विचार या एक सोच की पत्रिका भी नहॅ है पुरवार्इ्र। पुरवाई में सम्पूर्ण भारत बसता है। हमारा सौभाग्य है कि आज विश्व के करीब 26 देशों में पुरवाई अपने कदम रख चुकी है। इस विश्व हिन्दी सम्मेलन में दस वर्षीय पुरवाई उस नन्हॅ बालिका की तरह है, जिसकी आंखों में बड़े-बड़े सपने उमड़ने लगे हैं। वह देख सकती है कि हिन्दी का बुरा और भला किसमें है। सदा की तरह पुरवाई इस बार भी सकारात्मक दृष्टि के साथ विश्व हिन्दी सम्मेलन में पहुंच रही है। किसी भी भेदभाव से ऊपर उठ कर हम आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन को हिन्दी का एक और महायज्ञ मानते हैं। मैं चाहता हूं कि इस सम्मेलन से अमरीका के सैकड़ों हिन्दी प्रेमियों को वही सुख मिले जो 1999 में ब्रिटेन के हिन्दी प्रेमियों को मिला था। अपने प्रिय लेखकों का सान्निध्य, दूर अलग-अलग देशों से आए प्रतिनिधियों से परिचय और विभिन्न संस्थाओं के कार्यकर्ताओं से प्रेरणा मिलना ही विश्व हिन्दी सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

मैं आभारी हूं अपने साहित्यकार भाई तेजेन्द्र शर्मा जी का जिन्होंने पिछले दो वर्षों में पुरवाई के संपादक के रूप में पुरवाई को अपने साहित्यिक अंदाज़ में प्रस्तुत किया। इस पत्रिका को भारत के शीर्ष साहित्यकारों से जोड़ा। पुरवाई अब फिर हिन्दी प्रेमियों की गोद में आ गई है और अपने बड़ों के आशीर्वाद के साथ विश्व के समस्त उभरते हुए हिन्दी रचनाकारों के स्वागत में अपने दोनों हाथ फैलाए आप सबका अभिवादन कर रही है।

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